गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

'दोहे"

कुदरत के कानून को तोडा मत इंसान ।
तुम दोगे तो ही मिले जीवन का सम्मान ।।
ये धरती तेरी नहीं बस कब्ज़ा कुछ रोज ।
 क्यूँ खोया है ख्वाब  में रख ले कुछ तो होश ।।
जंगल धरती ये नदी देते जीवन दान ।
क्यूँ उजाड़ कर भूमि का करता है अपमान ।।
धरती माँ ने पाल कर कर दिया पूरा फ़र्ज़ ।
दूध नहीं तो गोद का कुछ उतार ले कर्ज ।।
'मोहन' माने माँ इसे माटी नहीं बेजान ।
अपनाए तब भी तुझे छोड़ जाये जब प्राण ।।

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