गुरुवार, 24 अगस्त 2017

बरसात और मुलाकात

जब मुलाकात हो तब बताना उसे 
मेरी हर एक बफा दे के आना उसे 
मै तरसता हु जितना बरसना वहां 
अपनी बूंदों से कम ही भिगाना उसे 

मेरे ख़त आज भी है पड़े मेज पर 
बिन बताये पता वो गयी रूठ कर
मैंने कितना था चाहा उसे टूट कर 
तुझको सब है पता ये पता ना उसे ,

जिस्म जिन्दा सही आँख पुरनम सही
वक़्त चलता रहा याद ठहरी रही
डूबता मैं रहा तू डुबाती रही
प्यार की सांसें सिसकी सुनाना उसे

माना रहबर है तू मैं खताबार हूँ
जो भी दे लो सज़ा सब मैं तैयार हूँ
कुंद आशिक ही तो है मुआफ़ करना उसे।

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