रविवार, 18 जुलाई 2021

बिन त्याग

बिन त्याग सभी को इस युग मे
अधिकार अधिकतम करना है
किसी को राम नही रहना
बस परसुराम ही बनना है

छोड़ना किसी को पसंद नही
थाली में एक कौर भी किसी के लिए
पर रोटियां किसको कितनी, तय करना 
ये शगल सभी को करना है

सेवा नही अब , व्यापार से कम
इंसानों का मेला, दुकानों का संगम
वनवास में किसी को नही तपना
सीधे अयोध्या पर राज करना है

संघर्ष की चटनी कौन पीसे मेहनत के सिलबट्टे से
कौन जमीर की आग जलाए दिल मे अंगगट्टे से
सबको डिब्बा बंद गफलत की लत लग गई है जैसे
किसी को किसी का इंतजार कब करना है

घर रहे तो राम थे, वन गए तो पुरुषोत्तम 
भगवान कहलाये क्योंकि सब सहने का था दम
अब सिर्फ नाम रखे जाते है राम के
जब युद्ध नही लड़ा तो तमगों का भी क्या करना है

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