किसे पता माली के अलावा निकले क्या अब की बारी
कोई दुःखी है उसको पाकर है, कोई दुखी उसको खोकर
कुछ आंखे है जल बिन प्यासी, कुछ प्यासी बनके पोखर
भूख है तो नशा भी, जहाँ ख्वाहिशो का ढेर वही बेज़ारी
जब तक कुछ है पास तुम्हारे , जगवाले पीछे रहते
पेड़ से ठूंठ बने जिस दिन तुम क्या रखे तुमसे रिश्ते
आग लगा देगा बेटा ही, पीछे चल दे संसारी
बंद मुठ्ठी भी थी खाली, खुली हथेली भी खाली
जेब नही कोई भी कफन में, झूठी बगिया सच्चा माली
फिर भी सब खुश है इसमें, नींद में चलना बीमारी
पंचतत्व के पुतले अपने, फिर एक कमी और बेगाने
राहगीर है सभी यहाँ पर, बस सत्य यहां आना जाना
सोचो जैसे लाइन में लगे, नंबर अगला किसकी बारी
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