शनिवार, 29 दिसंबर 2012

"ये किसकी है बेटियाँ "

ये 'दामिनी' ये  'अंजलि' ये किसकी है बेटियाँ
जब प्यार ममता चाहिए, किसकी शिकार ये बेटियां ।
नादान ये या हम सभी जो देखकर अनजान है
हम मूंद कर आँखे  समझते बच गई सब  बेटियां ।
हिंसक पशु पर हम दया करते नहीं फिर आज क्योँ
इन घूमते नरपशुओं से आओ बचा लें बेटियाँ ।
जब रोज चिंगारी उठे कब तक बचाएं ओढ़नी
ये आग लगने अब ना दे आओ बचा ले बेटियां ।
हम कब सिसक सुन पाएंगे ये झूठा बहरापन हटा
जब रूठ जाएगी देवी वो जो देती है हमें बेटियां ।
दामिनी को श्रद्धा सुमन  के साथ

"ईमान का मोल"

बाजार में आया हू मैं भी बिक ही जाऊंगा ,
मै कितना भी ना कहू आखिर संभल न पाउँगा ।
ये देश ये दुनिया सभी दौलत के आगे 'ढेर' है ,
इस रात के अँधेरे में कब तक दिया दिखाऊंगा ।।
नादान आँखों में मेरे सपने अगर मर भी गए ,
इंसान ही सब मर रहे तो इनको क्या बचाऊंगा ।।
तेरा दर्द मेरा दर्द है फिर भी खड़े सब मौन है ,
श्रधांजलि सब दे रहे मै इनको क्या समझाऊंगा  ।।
ये देश इक बाजार है मै हाट की इक 'चीज' बस ,
जब इतने सस्ते ये गए, मै ठहर ही क्या पाउँगा  ।।
कहते थे पहले 'मर गए जमीर' वाले लोग ये,
अब है नहीं जमीर जो जिन्दा कभी कर पाउँगा ।।
ये भ्रष्ट है अनजान ही है मोल क्या ईमान का,
बाजार में आया हू मै बेमोल ही बिक जाऊंगा ।।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

कुदरत है वरदान

कुदरत के कानून को तोडो मत इंसान ।
तुम दोगे तो ही मिले जीवन का सम्मान ।।
ये धरती तेरी नहीं बस कब्ज़ा कुछ रोज ।
 क्यूँ खोया है ख्वाब  में रख ले कुछ तो होश ।।
पेड़ बूटे काटकर पोसे स्वार्थ महान।
ये बायु व्यर्थ नही, बेअर्थ बिन वायु प्राण।।
जंगल धरती ये नदी देते जीवन दान ।
क्यूँ उजाड़ कर भूमि का करता है अपमान ।।
दुनिया मे सर्वोपरि, मतकर ये अभिमान।
कुदरत ही शरुआत है, कुदरत ही अंजाम ।।
धरती माँ ने पाल कर कर दिया पूरा फ़र्ज़ ।
दूध नहीं तो गोद का कुछ उतार ले कर्ज ।।
'शर्मा' माने माँ इसे कुदरत है वरदान ।
अपनाए तब भी हमें छोड़ जाये जब प्राण ।।




"कहाँ बचपन"

कूड़े के ढेर पर नंगे पैर, चल रहा मगर फिर भी बचपन।
गंदे हैं हाथ पर मन तो साफ, जल रहा मगर फिर भी बचपन ।।
छोटा सा पेट रोटी को देख
मन की दीवारों से टकराए,
पैसे से भूख न पैसा भूख
हाथों में झोला पकडाए ,
आंखे ढूंढे कोई अपनापन ।
बेटा कहता दिल में रहता
बालों में हाथ फिराता कोई,
कोई नहलाता लोरी गाता
सीने से मुझे चिपकाता कोई,
यही सोच रहा छोटा सा मन

कोई याद नहीं कोई साथ नहीं
अब तो जीना ही मकसद 
है,
 लातें घूसे थप्पड़ पूछे
सब चलते फिरते कीड़े 
है,
मिटटी से लगे इनका चन्दन  ।
मैं पूछता हूँ दुनिया वालों, क्यूँ छीन रहे इनका बचपन  ।
ये ढूंढे ही लेंगे खुद ब खुद , बस ये बतला दो "कहाँ बचपन" ।।

"बुड्ढा बाप"

क्या कहूं दुखी अंतर्मन है ,जैसे खुशियों से अनबन है ।
जिसने सीखा चलना मुझसे, उस लाल से मेरी अनबन है ।।
मै कहाँ मांगता रात और दिन
बस पास बैठ मेरे पल छिन,
क्या जिन्दा हो मेरे बाबू जी
बस यही पूछ ले तू हर दिन ,
कुछ दिन से न आया देखन है  ।।
मैं देख रहा उसका बचपन
कैसे पाला उन बातों को ,
कहता है परेशां हूँ तुमसे
सोने क्यूँ न देते रातों को ,
क्या यही सिला ये बंधन है ।।
आया वो सुबह ही कमरे में
और कहा चलो बाबूजी ऒ,
मैंने सोचा मैं धन्य हुआ
देखा बदले जो तेवर को ,
पर तभी राज कुछ और खुला
कुछ दूर ले जाके उसने कहा ,
अब यहीं रहो वृधाश्रम है ।।

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

ओ बचपन दीवाने

आ बापस तू आजा, ओ बचपन दीवाने,
न तोडू मै तुझसे ये रिश्ते पुराने ।
तू साथी है तब का जो कुछ था वो छोटा,
न आता समझ में जो दुनिया में होता,
तू ही मुझको समझा तू ही मुझको जाने,
दवे पाव से बैठा करता सिरहाने ।
मेरे होंठ सुबके हुआ दुःख तुझे भी,
मै संभला तेरे संग तेरे संग गिरा भी, 
दिखाता था दुनिया के रंगी फ़साने,
या सपनो में आता था मुझको हँसाने ।
ये कद क्यूँ बड़ा है क्योँ होती हया है,
ये क्या हो रहा है ये क्या माज़रा है,
तू बचपन भला था मज़ा ही मज़ा था,
मेरा हर खिलौना बस तुझसे सजा था,
पता अपना दे दे मै आऊं बुलाने,
या बापस तू आजा ओ बचपन दीवाने ।
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