शनिवार, 31 जुलाई 2021

अब की बारी

बंद लबों से अब क्या निकले मुस्काने या सिसकारी
किसे पता माली के अलावा निकले क्या अब की बारी

कोई दुःखी है उसको पाकर है, कोई दुखी उसको खोकर
कुछ आंखे है जल बिन प्यासी, कुछ प्यासी बनके पोखर
भूख है तो नशा भी, जहाँ ख्वाहिशो का ढेर वही बेज़ारी

जब तक कुछ है पास तुम्हारे , जगवाले पीछे रहते
पेड़ से ठूंठ बने जिस दिन तुम क्या रखे तुमसे रिश्ते
आग लगा देगा बेटा ही, पीछे चल दे संसारी

बंद मुठ्ठी भी थी खाली, खुली हथेली भी खाली
जेब नही कोई भी कफन में, झूठी बगिया सच्चा माली
फिर भी सब खुश है इसमें, नींद में चलना बीमारी

पंचतत्व के पुतले अपने, फिर एक कमी और बेगाने
राहगीर है सभी यहाँ पर, बस सत्य यहां आना जाना
सोचो जैसे लाइन में लगे, नंबर अगला किसकी बारी

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

न्यौछावर मत करना

दुनिया मे दो लोग तुम्हे जान से भी प्यारे है
एक तो पापा तुम्हारे मगर दूसरा कौन है
हम से क्यूं हिचकिचाते हो बताने में
आखिर क्यों, सवाल का जवाब, मौन है

उसके शौक, आदत, रंग ढंग,
और कितना कुछ यूं ही बताते रहते हो मुझे
बातों में बस बो ही वो तुम्हारे पर
पर्दे में ढका चेहरा नही, पर्दा दिखाते रहते हो मुझे

मेरे चुटकुले भी अब खुलकर हंसा नही पाते 
मगर खुद बेसाख्ता मुस्कुराने लगते हो
पता नही, ऐसा क्या है उसमें ख़ास जो
आजकल बड़ा महके महके से रहते हो

पहले तो मेरे आने से पहले तुम जान जाती 
पर अब तो मेरे जाने का भी ख्याल नही
प्यार के निरे नशे में हो जैसे
मेरी तो मेरी खुद की भी देखभाल नही

एकटक मुझे देख रही हो जैसे
 मुझमे भी उसकी ही तलाशी हो
कोई राज सा लगता है हँसने में 
जब पूछता हूं और मेरी लाडो कैसी हो

मेरी दोस्ती है वो जो तुम कहो तो
रात या दिन नही देखेगी तेरे लिए
कोई वादा नही, ना सही, फिर भी
यारी मेरी, कोई शर्त नही रखेगी तेरे लिए

मैं नही कहता प्यार मत करो उससे
बस एक तरफा मत करना
मेरी जान है तुम्हारी भोली हंसी में
प्लीज हाथ जोड़ता हूँ, उस पर न्यौछावर मत करना

प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना

मुई

मैं कैसे कहूँ जिंदगी अच्छी थी या बुरी
बहुत बेतरतीव गुजरी जितनी भी गुजरी

मनचाहा तो किसी को भी नही मिलता यहाँ

मलाल तो ये है मुई जिंदगी जिंदगी सी नही गुजरी

सोमवार, 26 जुलाई 2021

भोले

बूँद को सागर से बात करनी है
मेरा मन नही मेरा नही तुम्हारी नगरी है
भोले मुझ अज्ञानी का हाथ मत छोड़ना
एक डोर है कठपुतली में, वो भी तुमसे जुड़ी है

भस्म का श्रृंगार, भांग का प्याला
और भी बहुत कुछ है इंतजार में
भूत पिशाच चांडाल भी कितना रो रहे है
 भूतेश्वर के इंतजार में
अब देर न करो सावन हाथ जोड़े खड़ा है
कितनी हिलोरें बैठी है उसके मन मे

महादेव

जटाधारी बाबा तुम्हारा
एक और शरणागत आ गया
दर्शन का बड़ा प्यासा हूँ
एक बूंद को तरसा गया
वैसे तो मुझे मेरे महादेव दिल मे रखने है पर
सावन की झमाझम पर मेरे शिव का दिल आ गया

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

मुँहचैट

निखट्टू को थोडा सुंदर क्या बना दिया
देखो तो इसमें कितनी ऐंठ है
कितना मासूम मुँह है मेरे सोना का
पर मुआ कितना मुँहचैट है
जब मुस्कुराना ही नही था मुझे देखकर फिर
खुदा से लिए ही क्यों इसने इतने प्यारे होंठ है
अब तक तो अंधा भी, मेरी आँखों मे प्यार है जान जाता
मुझे तो लगता मेरे जानू की आंखों में ही खोंट है

रविवार, 18 जुलाई 2021

बिन त्याग

बिन त्याग सभी को इस युग मे
अधिकार अधिकतम करना है
किसी को राम नही रहना
बस परसुराम ही बनना है

छोड़ना किसी को पसंद नही
थाली में एक कौर भी किसी के लिए
पर रोटियां किसको कितनी, तय करना 
ये शगल सभी को करना है

सेवा नही अब , व्यापार से कम
इंसानों का मेला, दुकानों का संगम
वनवास में किसी को नही तपना
सीधे अयोध्या पर राज करना है

संघर्ष की चटनी कौन पीसे मेहनत के सिलबट्टे से
कौन जमीर की आग जलाए दिल मे अंगगट्टे से
सबको डिब्बा बंद गफलत की लत लग गई है जैसे
किसी को किसी का इंतजार कब करना है

घर रहे तो राम थे, वन गए तो पुरुषोत्तम 
भगवान कहलाये क्योंकि सब सहने का था दम
अब सिर्फ नाम रखे जाते है राम के
जब युद्ध नही लड़ा तो तमगों का भी क्या करना है

शहर का तजुर्बा

इस शहर ने मुझे क्या क्या सिखाया है
मैं जब जब भी गिरा ये मुस्कुराया है
कभी छत ढूंढता था सिर ढकने को छोटी सी
अब तो फुरसत नही रुकने की, कैसा काम आया है

नए रास्तो से डरकर निकलता था कभी
रोशनी कर चेहरों से इंसान पहचानता था सभी
आज रास्ते पैरों से और इंसान कीमत से पहचानता हूं
बहुत देर में, वक़्त गुजरते गुजरते ऐसा मुकाम आया है

मुझे दर्द होता था गॉंव में कोई भी बीमार हो
सहने का तजुर्बा न था किसी पर वक़्त की मार हो
अब अर्थी भी पास से गुजरे तो फोन रखता नही
इस शहर ने शहरी होने का ऐसा नशा सुंघाया है

इस्तेमाल करो सबको या हो जाओ
जब तक काम न निकले, मंडराओ
मक्खी से फेंके जाओगे इसलिए काम के बने रहो
बस इसलिए पुर्जा पुर्जा काम मे लगाया है

जो दिखता है वो बिकता है, तजुर्बा किया मैंने
कंधे पर चढ़कर और ऊंचा होने दिया मैंने
चढ़ने वाले ने जब मेरे सिर पर ठीकरा फोड़ दिया
तब पहली बार किसी साथी को औंधे मुँह गिराया है

पैसा पावर और पागलपन अहम का
कैसा नशा है, अपना मजा है वहम का
रास आने लगा है, शहर सिनेमा सा चल रहा आंखों में
मैंने वो सब देखा है जो जो इसने मुझे दिखाया है

अब शहर से कोई गिला नही है कि
मैं जब भी गिरा ये मुस्कुराया है।
शहर के एहसान गांव से ज्यादा है इसलिए
लड़ जाता हूं किसी ने मुझे देहाती बताया है

प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना

जमाना

वो भी क्या जमाना था जब लोग
सलाम करने का सलीका जानते थे
अपनी सी बात करते थे वो और
अपनेपन का मतलब भी जानते थे
अब सिर्फ मतलब की है दुनिया
वक़्त निकले तो पूछते है क्या आप पुरानी पहचान के थे






शर्माजी के अनुभव : बलात्कारी का बाप

मन्दिर की सीढ़ियों पर आज मैं टकरा गया
कोई जो बैठा था अंजान, घबरा गया
हम दोनों ही माफी मांग रहे थे आपस मे
अनायास, रंग ढंग उनका नाम याद करा गया

सज्जन का बेटा मेरे बेटे के साथ पढ़ा था
उनको यहाँ देख मुझको अचरज बड़ा था
मैं बोला भाईसाहब साथ चले क्या मंदिर में
न जाने इतना सज्जन व्यक्ति किस गम में गड़ा था

पहचानकर, बोले आप हो आइये मैं यही रुकूँगा
मेरी कट्टी है जरा भगवान से, इससे आगे नही चढूगा
मैं भी जल्दी ही जाकर लौट आया दर्शन कर
चलिए घर चले आपके साथ चाय पर गपशप करूँगा

हम पैदल ही चले आये अब घर मे हम ही थे
आज पता नही क्यों वो ज्यादातर चुप ही थे
मुझे खल गई खामोशी तो पूछा बेटा कैसा है आपका
लगा मेरे शब्द उनके लिए जहर बुझे तीर ही थे

उफन उठा दर्द का सैलाब आँखों मे उनके
धागा टूट गया और बिखर उठे आंसू के मनके
मुझे याद आ गया उनका उनके बेटे के लिए प्यार
पर कई सवाल मन मे मेरे अब भी थे अनसुलझे

बोले जाने कैसे एक रावण पैदा हो गया मेरे घर
मान सम्मान अभिमान साथ अपने ले गया वो जर
मैंने लक्ष्मण रेखा कितनी ही खींची संस्कारो की
पाप के पुष्पक पर चला गया इज्जत की अर्थी लेकर

सुनता हूं अब जेल में सर पटक कर रोता है
बाप हूँ न सुनकर दिल मे दर्द अटक कर होता है
पाप उसका ही है या मैं भी दोषी तो नही
कैसे कह दूँ वही मिलता है सबको जो बोता है

मैं उसकी माँ बहन से कहता हूं भूल जाओ उसे
मर गया वो अपने लिए मन से मारकर वहा दो उसे
पर खुद ब खुद आँखे निचुड़ उठती है मेरी
आखिर हमने ही पाल पोस कर बड़ा किया जो उसे

कई बार सोचा जेल में चला जाऊं उससे मिलने
जीते रहो ना कह पाऊंगा अब, गर लगा पैर छूने
हिम्मत टूट गई है मेरी, अब कैसे जिंदा रहूँगा मैं
उस बेटे का बाप होना, मेरी सांसे भी कैसे कबूले

लगे सना हर लड़की का चेहरा, मेरे बेटे का ही खून है
मुझे नही पता, इज्जत लूटना किसी की, कैसा जुनून है
बलात्कार होकर अब मैं भी जानता हूं कैसा लगता है
नंगे बदन खड़ा हूँ जैसे, और सामने बाजार का हुजूम है

हर बच्ची के पैर धोकर पियूँ, क्या कालिख धुल पाएगी
जब हर बेटी का अपराधी हूँ, क्या माफी मिल पायेगी
मैं जानता हूं संपोला वो है तो सांप मैं भी तो हूँ
इस बलात्कारी के बाप को कैसे मुक्ति मिल पाएगी
इस बलात्कारी के बाप को कैसे मुक्ति मिल पाएगी

उनके दर्द से मैं भी पिघल गया
मेरा दिल कुछ पल के लिए जैसे गल गया
मैं बोला जो हुआ उसकी सजा एक उम्र से बड़ी है
सच मे बेटा अंधेरे की गर्त में फिसल गया

पर आप चाहे तो ये पाप का बोझ कम होगा
जिस बेटी से गलत हुआ, जब उसको न्यायसुगम होगा
हर बेटी को सम्मान मिलेगा तब ही दुनिया मे
जब बेटे के बापों मे ध्रतराष्ट्रपना कम होगा

कुछ भी नही

अगर मरने से पहले जीना सीख गए तो अच्छा है
वरना जिंदगी कड़वी दवाई से ज्यादा कुछ भी नही
घर बार इज्जत पैसा सबका वादा है मगर
ये कब तक है इस वादे का वादा कुछ भी नही



प्रेम हेतु नम्य

दृश्य: कामदेव भस्मीभूत है, रति भस्म के पास बैठी शिव को संबोधित कर रही है।

हे विश्वनाथ, क्या मेरे नाथ अक्षम्य थे
प्रेम और बस प्रेम हेतु ही तो नम्य थे
बिन आज्ञा, अपने प्रभु से कुछ चाहना पाप है क्या
क्या मेरे कामदेव के कर्म इतने जघन्य थे

माना सर्वेश्वर आप हम सब के स्वामी हो
मेरे देव ने चाहा बस आप उमा के स्वामी हो
हे देवो के देव, क्या संतुलन प्रकृति में आवश्यक नही
क्या सही नही अब, शिव शक्ति संगामी हो

विरक्त अगर पिता पुत्रो से हो जाये
कैसा दुर्भाग्य होगा उन पुत्रों का हाये
आप तो सदा से परमपिता है इस नश्वर जगत के
फिर आप कैसे चाहेंगे, बच्चे बिन माँ के रह जाये

मैं रति, अधूरी हूँ उन बिन
आपकी इच्छा से होता क्या रात क्या दिन
दासी की विनती है, या उन्हें लौटाए मुझे
या मुझे भी भस्मीभूत करें इसी क्षिण

अंतिम शब्द है मेरे, प्रेम की पूंजी छीन रहे है सब से
सती बिन जी रहे है, क्रोध में जल रहे है कब से
हे भोलेनाथ, जिस विरह में आप है मैं भी तो हूँ अब
क्या मेरा दर्द किंचित भी पृथक आपके दुख से

मेरे देव चले गए, कैसे अतृप्त को अब सिक्त करें
हे त्रिनेत्र, मुझे जीव बंधन से मुक्त करें
हम धन्य हुए ये जो भी हुआ, मेरा जन्म सफल हुआ
प्रेम हेतु जी लिये, दीनानाथ प्रेम प्रवाह में विमुक्त करें



बुधवार, 14 जुलाई 2021

मैं इंसान हूँ

विकसित समाज में
सम आज कुछ कहाँ रहे
फासलों का दौर है आया
जरूरी है दूरी, समझा रहे
भाव की पर्ची लिए फिरते है लोग
तख्त जितना ऊँचा, सर उतना झुका रहे
कागज का टुकड़ा था कभी पैसा
उस हाथों के मैल से ईमान सजा रहे
अब वो बात कहां इंसानों में
नींद के लिए तक तो गोली खा रहे
मौसमी बारिश हुए दशक गुजरे
फिर भी मौसम समाचार भविष्य बता रहे
हम उलझे है ऐसे खुद से जैसे
आखरी सांस तक सिरे मिला रहे
माँ बाप आश्रम में छोड़े और बीबी को घर मे
बच्चों को उनके कल का सपना दिखा रहे
नाक इतनी ऊँची है, मक्खी भी नही पहुंचेगी
पर गरीब तो मक्खी के साथ खाना तक खा रहे
बच्चे नही, अमीरी के ख्वाब जाते है स्कूल
सब बेचकर पैसा खरीदो, सिखा रहे
हर किसी का काम बंटा है फायदे से
औरत सामान दिखा रहीं, मर्द घर पहुंचा रहे
कोई कीड़ा ही होगा पिछली पीढ़ी को काटा
आज इंसान इंसान को मशीन बना रहे
नादान रहने दो मुझे समझदार नही होना
मेरा गुरुर मैं इंसान हूँ, बस ये बना रहे

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

विरहाकुल साधू

दृश्य: सती भस्म लपेटे महादेव वन वन विचर कर विचार कर रहे है

विरहाकुल साधू हूँ
कहाँ तक आ गया हूं मैं
क्यों प्रतिध्वनित हृदय है मेरा
एकांत वन में अदृश्य साथी पा गया हूं मैं

तज दिया वियोग में सब
जो पाया या बनाया मैंने
ओ सती, बस इतना बता दो
क्या प्रेमवंधन ठीक निभाया था मैंने

मैंने शमशान देखे
अशांत कोई स्वर न हुआ वहाँ
भूतेस्वर हूं मैं तो क्या
सत से तृप्त किंचित न हुआ वहाँ

जोग सिखाता था मैं उसे
सती योग सिखाती थी मुझे
उसके जाने के बाद पता नही क्यों
विरक्ति शिक्षा भी झूठा बताती थी मुझे

मैंने कहा प्रिय सती
प्रेम और साधना एक कभी नही हुए
सती का उत्तर था संयुक्त है नाथ ये
विमुक्त ही कभी नही हुए

कोई साधक ही नही
जिसने स्व साधना से प्रेम ही न किया
अन्यथा न लेना नटसम्राट
दीक्षा दें यदि कोई नृत्य राग बिन किया

ओ सती तुम्हारी बात का
अब मर्म जानता हूं मैं
तुम्हारे प्रेम बिन अब कोई साधना
बेअर्थ मानता हूं मैं




...