मैं चाहे कितने ही रंग में बिखरूं
मन्नत तो तेरे रंग की ही की थी
तेरी खुशबू से महका क्यों ना करूँ
मेरी बाहों में तूने सांसे जो ली थी
प्यार किया इसमें गलती कोई नही मेरी
तू ही तो था वो जिसने मेरी जिंदगी को बजह दी थी
प्यार का रंग चढ़ता गया जैसे सुहाग की मेहंदी हो
दूर कैसे जाऊं मैं, जब हर सांस तुझसे ही बंधी हो
नाम मे क्या रखा है जब हम दो ही हो जहां में
तू मेरा बंदा है और मैं तेरी बंदी हो
जब तेरी खुशबू ने मेरी साँसों में दस्तक दी है,
बस खुदा जानता है दिल ने इक मन्नत की है
ये अदा का परचम और मेरे जिगर का फलक
खुदा क्या खुद को देखने की कब फुरसत दी है
हुस्न दो दिन का है तो इतना कहर ढाओगी
इतना न इतराओ कभी ढल जाओगी
गुलाब से होंठ, नागिन सी कमर न जाने क्या क्या
कौन बच पाएगा जब इतने खंजर चलाओगी
आईने हुस्न से जरा दूर होना चाहिए
खैर हो रूह की वो नूर होना चाहिए
माना कुछ गुरूर हो बर्दाश्त है नादानी में
दिल में आने का कुछ शऊर होना चाहिए