रहमत हुई की इल्म ने पहचाना है मुझे, हर शख्श की तक़दीर यूँ रोशन नहीं होती....
तेरे आसरे की आस ने आंसू रोके वर्ना इस ख़्वार को जीने की वजह क्या होती मेरा हर दर्द दुआ बनके मिला है तुझसे तेरे बिन रूह के जख्मों की दवा क्या होती हंस के मिलता ही गया देख न पाए कोई आँखों की नमी खुशियाँ लुटाने के सिवा तेरी रजा क्या होती