शुक्रवार, 24 मई 2013

यादें याद आती है

हर वक़्त सोचता हूँ टीस कहीं होती है
अश्क बहते नहीं पर सांसे सर्द होती है
वक़्त कटता नहीं बस काटता ही रहता है
प्यार का ऐसा अक्स प्रीत होती है
 
मोहब्बत कितनी करो काफी नहीं होती 
इस गुणा भाग में सांसे बाकी नहीं होती
उम्र घटती तो जुड़ता है आशियाना 
रात को जिस्म सोता है मगर बाहें नहीं सोती 

बस कोई दर्द चाहिए जिन्दगी के लिए
प्यार के बदले ही आये मगर किसी के लिए 
नाम लेकर अगर पहचाना तो क्या पहचाना
बात है सांस् समझ जाये किसी बू के लिए 

याद तुम्हे करके गुस्ताखी कर बैठे, 
एक हिचकी हर याद की खातिर कर बैठे
रख ली एक तस्वीर बना कर दिल पर भी
सोये तो उसे ख्वाब में शामिल कर बैठे

 क़भी दो लफ़्ज़ ही काफी हैं बताने के लिए 
कहीं कोई उम्र लग जाती है जताने में
कोई पा जाये तुझे देख पूरे दिन की ख़ुशी
तो हर्ज ही क्या है उसे देख मुस्कुराने में 

हमसफ़र

ये जो नजरें मिली ये लगा दिल गया
एक तू जो मिला ये जहाँ मिल गया
हर छुअन में बफा है हवा में महक, हर तरफ तू ही तू में मेरा 'मैं' गया
कल तलक ये हवा ये फिजा और थी
रातें छोटी थी काली  अदा और थी
अब जुदा है समां रातें रंगीन है, जैसे इसको  तेरा आसरा मिल गया
जाने कितने मिले जाने कितने गए
भूल की धुल में सब के सब मिल गए
मैंने चाहा तुझे भूल से भूलना, मेरी सांसो से पहले ये दिल रुक गया
हर मुसाफिर को इतनी दुआ चाहिए
साथी तुझ सा मेरी सी बफा चाहिए
इन निगाहों ने बरसो था ढूँढा जिसे तुझको देखा तो वो 'हमसफ़र' मिल गया

क्या यही प्यार है...

नादानों की बस्ती में कुछ राज नहीं होता 
हर फूल में खुशबू का एहसास नहीं होता 
 ये पूरी होगी कैसे जन्न्त की चाह आखिर
जब सजदा ए खुदा में बिश्वास नहीं होता 

हम जान गवा बैठे की वो मेरा महताब है
सुर्ख गालों पर मेरी खातिर शवाव है
ना जानना ही चाहा न जान ही हम पाये
मेरी जान के चेहरे पर असली नकाब है  

हम लाये थे तूफ़ान से कश्ती निकाल के 
अब फिर वही बापस चले सब देख भाल के
फिर इश्क का मसीहा हमको बुला रहा है
सब मिट रहे है दिल से जो कुछ मलाल थे

कभी किसी के आंसू पोछो तो कुछ उसको जानोगे 
गोद में सर आँखों में आँखे तो दिल की तुम मानोगे
बहुत जला कर राख बनाये ढेर पे कुर्सी डाले हो 
चिंगारी से दिया जलाओ तो सबको पहचानोगे 

प्यार में गुस्ताख हो जाये तो मुआफ कर दो 
ना कोई गिला दिल में मुझे प्यार की मेहर दो
मैं चाहता हूँ तुमको एहसान नहीं कोई 
मेरे दिल को अपना घर कर मेरे घर को अपना कर लो

सूद चुकाए जाते हैं क्योँ दिल का दांव लगाया था 
हार जाना जब आदत थी क्यों किस्मत को आजमाया था 
आखों में चमक होंटो पे हंसी जब अपनी नहीं मालूम मुझे
दिल पर मेरे हाथ क्यों रक्खा जब रखना मुझे पराया था 



समाज

इस समाज और कुछ नही बस शोर मचाना आता है
अच्छे दिन आएंगे एक दिन, दिल बहलाना आता है
जिम्मेदारी किस पर डालें, चर्चा है हर बस्ती में 
इसकी गलती उसकी गलती रोज बहाना आता है

जिन्दा होने का सबब बूझो ना कैसे
लगे लब से लब पूछो ना किस्से
वो घुलकर उतर गए सांसो में ऐसे
पिघले सूरज का सांझ में उतरना जैसे

रूठो मत अब मान ही जाओ अच्छा है
कब मानोगे प्यार भी मेरा सच्चा है 
सोच लो छलक कर रो न दे कहीं
मानो या ना मानो दिल तो बच्चा है  


मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बेशर्म जमाना

"बेशर्म जमाना " कहता है ये बेटी किसकी कौन है ये
जज्बाती है, नादाँ है ये गूंगी तो नहीं पर मौन है ये
ये बातें सुनती रिश्तों की तो कांप उठे कर नैन सजल
किस्से पूछू कोई बतला दो पहचानो रुदन हाँ कौन है ये
कोरा काजल बन बही है ये श्रंगार नहीं बन पाई है
जीवन में अश्रुधार सिवा कोई राग नहीं दे पाई है
अभी बचपन ही तो लांघा है मासूम सी है पर कौन है ये
घर की इज्ज़त गृह लक्ष्मी थी, बेटी या बहन या पत्नी थी
रोशन थी घर की दीवारें इससे क्यारी भी फूली थी
अब नहीं जरूरी कौन है बस अब तो सिर्फ अछूत है ये
 कोई कहता प्रेमी छोड़ गया कोई बोले घर से भागी है
कोई खड़ा मौन फटे वस्त्र तके कोई कहे बड़ी अपराधी है
हमउम्र है मेरी बेटी से कैसे कह दूं मैं कौन है ये 

गुडिया के अपराधी हम सभी हैं क्यूंकि हम उसी समाज का हिस्सा है जिसका वह शिकार हुई 

शनिवार, 12 जनवरी 2013

"पाक या नापाक"

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मेरे बच्चो को रुलाना छोड़ दे,
मै हिंदुस्तान हू मुझको सताना छोड़ दे ।

मेरे हाथो में बरदान है, अभिशाप भी है;
मेरी मोह्हब्बत को आजमाना छोड़ दे। ।

मेरे कश्मीर से तेरी कराची दूर कब थी;
बस मेरी बस्ती के घर जलाना छोड़ दे ।

आह सुन बच्चो की तेरे, कितने चूल्हे बंद है;
सीख कुछ, उधार का बारूद लाना छोड़ दे ।

खून तुझमे है मगर, उसमे मुरब्बत अब नहीं;
बच्चो को दिल से लगा, नफरत सिखाना छोड़ दे ।

चाहा कितनी बार ,तू अपना था अपना रहे;
हाथ क्या दिल मिला, और दिल जलाना छोड़ दे ।

फिर समां जाओगे हिंदुस्तान में, जिद मत करो, 
 मेरे बेटे सख्त है, इनको चिड़ाना छोड़ दे । 

पाक को नापाक, कर रक्खा अपने कर्मो से;
या संभल जा या मेरे घर आना जाना छोड़ दे 
।
***~~***

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

"आकांक्षा"

उठ खड़े हुए है हम, नए साल के स्वागत में ।
कोई अभाव न रह जाये, नब आगत के स्वागत में ।।
आंखे मलता सूरज आया फैले किरणों सी खुशियाँ ।
जीवन तरंग बज उठे गगन , नब आगत की आहट में ।।
उज्जवल भविष्य के आने पर अधरों पर मुस्काने तैरे ।
ढांढस बंध पाए मानव को, दिए जले गर्त अंधियारों में ।।
इस जीवन में ही खोज सकें, जीवन रहस्य अनसुलझे ।
हो दया शक्त , निस्वार्थ प्रेम, जगती के हर जीवित में ।।
न हो अधीर ये आस करे, जीवन सुखी और शांत बने ।
हर क्षुब्ध को तृष्णा मुक्त करे प्रभु नए साल के आगत में ।।
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