सोमवार, 9 अगस्त 2021

पिघल

पिघल चुके हो गर्मी से तो बहते क्यों नही
दिल मे रखे सामने हो, सामना करते क्यों नही
मरे जा रहे हो उन पर, क्या मर कर ही मानोगे
बागी दिल होने से पहले उनसे कहते क्यों नही


तेरा चेहरा मुझे मेरा सपना लगे
तुम ऐसे हो, गूंगा दिल अपना कहे
जी चाहता है जी भर कर देखना तुझे मगर
कैसे डालूं नजर कि नजर न लगे



दुआ

दुआ मुफ्त मिलती नही, मनानी पड़ती है
खुशियां चलकर आती नही, कमानी पड़ती है
किस्मत भी अजीब है जिन हाथ की लकीरों में हो
उन्ही हाथो से ही रोज बनानी पड़ती है

हम सफर में रहे हमसफर के इंतजार में
कोई तो होगा हम सा,इतने बड़े से संसार मे
गलत मैं ही हमेशा रहा, इस बार का क्या गम
ऐ खुदा अकेला ही बनाया, क्या इतना बेकार मैं


पा लेना

पा लेना हसरत कब थी मेरी, बस खोने से डरते थे।
समझते तो सब कुछ थे, बस कहने से डरते थे।
जब मांग ही रहे हो अपना हिस्सा, तो सुन लो
तोलमोल अबतक नही सीखे हम तो बस प्यार करते थे। 

जिंदगी है मेरी, कोई उधार थोड़ी है
जो तुम कर रहे हो, वो प्यार थोड़ी है
सफेद दिन गए तो काली रात भी ढल ही जाएगी
मेरी किस्मत मुझ सी है, तुम जैसी मक्कार थोड़ी है


शिव 3सोमवार

याद आती है जब तेज हवाओं में
लगता है दास को आवाज दे रहे हो
बूंदे बरसती है तन पर तो मुझे
लगता है नटराज आप साज दे रहे हो
हर कण जब आप ही आप हो निराकार
क्यों मुझ कण को विरह का संताप दे रहे हो

बीते मेरी शिव शिव रटते, चाहे कितनी हो उमरिया
भूल ही जाऊँ कौन हूँ मैं, और कौन है मेरी डगरिया
मुझे पता कुछ आज है रूठे, कल मानेंगे भोलेनाथ
चरणों से ही बस जाऊंगा, जब थामेंगे मेरी उंगलिया



गुरुवार, 5 अगस्त 2021

शर्माजी के अनुभव : बहू का असुराल

बात छोटी सी है, मगर मुश्किल बड़ी है,
बहू बेटी दोनों बराबर, किस अंतर से छोटी बड़ी है।
दोनों इज्जत ही तो है अपने घराने की, 
जिद सी क्यों है फिर अहम दिखाने की।
ये बात ज्यादा पुरानी नही है,
पर ऐसी है मुझसे भूली जानी नही है।
सफर कर रहा था बस का, 
बस छोटा बैग और मैं तन्हा।
साथ बैठी महिला मुझसे बड़ी थी,
उनकी आंखें अपने हाथ की तस्वीर पर गड़ी थी।
शायद उनके परिवार की तस्वीर थी, 
आंखों में थे आंसू और दिल मे भारी पीर थी।
अचरज तब हुआ, तस्वीर के छोटे टुकड़े कर गिरा दिए,
आंसू पोंछ कर आंखों के, उनके होंठ मुस्कुरा दिए।
उलझन में कितनी बाते सोच गया पल में,
लगा पत्थर ही पड़ ही गए हो मेरी अकल में।
तभी टिकट टिकट की आवाज आई,
मैंने पैसे बढ़ाये तब उसे सांस आई।
फिर महिला से पैसे मांगे तो उत्तर मिला, नही है,
टिकट बाबू बोला भाभी बस से उतरे ये मेला नही है।
मैंने झिझकते हुए कहा क्या मैं दे दूँ,
महिला ने मुझे एक नजर देखा, बोली मैं क्या कहूँ।
मैंने पूछा कहाँ का लेना है टिकट,
महिला ने कुछ न कहा समस्या बड़ी विकट।
मैंने अपने गंतव्य का टिकट ही एक और लिया,
महिला ने देखा तो उनकी ओर बढ़ा दिया।
महिला ने देखकर मुझे कहा भैया शुक्रिया,
शुक्रिया मत कहें बस बता दे ये क्या किया। 
मेरे सवाल पर महिला की नजर ठहर गई,
बोली परिवार नही मेरा जिस पर आपकी नजर गई।
मैं बोला फिर दर्द क्यों था आपकी आँखों मे,
बोली ये फंदा था जिसे काट पाई हूँ सालों में।
हो चुकी बर्बादी नही, आजादी के आंसू छलके,
मेरा दर्द मेरा अपना है बस, आपसे अच्छा लगा मिलके।
मैंने कहा ठीक है और ना बताये न सही,
अब कोई ठिकाना है जहाँ जाना हो कहीं।
बोली बाहर की दुनिया मैंने देखी कभी नही,
मैं बोला आप सी हिम्मत मैंने देखी कहीं नही।
बोली ससुराल नही असुराल में रही हूँ ना,
थप्पड़ घूंसे लात ताने और कितना कुछ सही हूँ ना।
हर हाल में जीने की हिम्मत में जिंदा रही,
दरिंदो के बीच में परकटा परिंदा रही।
मैं बरबस पूंछ बैठा क्या कोई अपना नही आपका,
बोली किस्मत में कंकर लिखे तो क्या दोष बाप का।
मैंने कहा चाहे तो आप मायके चली जाए,
बोली दिल के मरीज की क्यो बिन कसूर जान ली जाए।
मेघ से बूंद गिरना अकेले, पवन भी क्या कर सकती है,
कहने के दो घर बेटी के, इतने में सबर कर सकती है।
मैं बोला भाई कहा है, कोई मदद कर सकूं तो बताये,
मैं बर्तन चूल्हा ही कर सकती हूं भैया काम दिलवाये।
मुस्कुरा उठा मैं उनके साहस का कायल था,
पर उनके दर्द से आज अंदर तक घायल था।
पिता बिदा कर अरमानो संग भेज देता है ससुराल,
कैसे दूसरा घर ही बन जाता है बेटी के लिए असुराल।
सोच रहा था गलती हुई पुरुषत्व को बड़ा कहने में,
डर लगा था उनकी जगह भी आज खुद को रखने में।

प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

तुम जरूर जाना

आज क्या हुआ तुझे, क्या कहती है
तुझे कैसे समझाऊं बस तू ही दिल मे रहती है
मुझे लड़कियां बस दूर से ही पसंद आती है
एक तू ही है जो मेरी बाहों में भली लगती है

तुझे रोज रोज मुझसे लव यू क्यों सुनना है
प्यार है तो है इसमें रोज शक क्या करना है
नेम प्लेट टांग देता अगर मेरा दिल घर होता तो
मेरी सच्ची बातें भी क्यों झूठ में तली लगती है

वो ऐसा करता है उसके लिए, तो करने दे ना
मेरी बातों पर नही तो मुझ पर यक़ी कर ले ना
पैसे से प्यार खरीद सकते तो आधी दुनिया फ़क़ीर होती
भूल जा मुझे अगर गैर की आंखे मखमली लगती है

मेरे प्यार को मैं अच्छे से जानता हूं, शायद तुम नही
मैं उस मोड़ पर खड़ा हूँ मोहब्बत नही तो मैं नही
मेरा क्या है जहाँ से आया लौट जाऊंगा वहीं
तुम जरूर जाना वहाँ, जहाँ प्यार की बोली लगती है

आखरी पल

मेरे जिंदगी के आखरी पल है
मुझे जी लेने दे
कल मेरी शादी है मेरी सांसो को
शरीर के कफन में सी लेने दे
कह तो रही हूँ हमारा साथ यही तक था
रोने न दे आंसुओ का सैलाब जहाँ है वही रहने दे
अगले जनम में इंतजार करना मेरा
अभी दुश्मन जिंदगी के हाथो जहर पी लेने दे
प्यार खुदा की नेमत है, मैंने पलको पर सजा लिया
अब इसकी सजा में मिल रही है कैद तो ये भी लेने दे
मैंने मेरी खुशी से तेरा सदका उतारा है, तो खुश रहना
पता है दुआ ये लगे मुश्किल है पर फिर भी ले लेने दे
तेरी तबियत खराब हो जाती है, देख रोना मत
मैं कुछ पल हूँ, सभी आंसू मेरी पलको पर गिरा लेने दे
मैंने साथ तेरा मांगा खुदा से हर पल, सिला मिल गया
मुझे कुछ नही देखना तेरे सिवा आंखों में बसा लेने दे
तू कहता था न मैं तेरी हिम्मत हूँ , साथ तो हूँ, क्या हुआ
इस लाश को आखरी बार तेरे होंठो को छू लेने दे

दीवाना तो बड़ा खराब है

बात थोड़ी सी तो कर ले मुझसे
क्यों इतनी नाराज है
कल तक सुबह का अलार्म थी ये
आज क्या हुआ मेरी इतनी खराब आवाज है
गिले शिकवे चुप रह कर नही किये जाते पागल
अब खोल भी दे जो गुस्से का बैराज है
झूठ आज तक तुझसे कब बोल पाया मैं
कभी सच्चा नही लगा मेरा प्यार क्या ये बात है
न बात कर तो सर ही रख लेने दे गोद में
एक पल भी नही खोना चाहता जो आज है
तेरी उंगलियां क्यों कांप रही है मेरे हाथों में
घबरा रहा है दिल मेरा कह दे क्या राज है
देख रो न दूँ कही छूट कर तुझसे वरना
मुस्कुरा ना, तेरी हंसी मेरी सिराज है
कसम है मुझे मेरी, कह दे वो सब कर दूंगा
तुझे हरपल खुश रखना हमेशा से मेरा ख्वाब है
मेरे इश्क की हद मत टटोल कर देख, पछताएगी
सोचेगी तन्हा बैठकर दीवाना तो बड़ा खराब है

शनिवार, 31 जुलाई 2021

अब की बारी

बंद लबों से अब क्या निकले मुस्काने या सिसकारी
किसे पता माली के अलावा निकले क्या अब की बारी

कोई दुःखी है उसको पाकर है, कोई दुखी उसको खोकर
कुछ आंखे है जल बिन प्यासी, कुछ प्यासी बनके पोखर
भूख है तो नशा भी, जहाँ ख्वाहिशो का ढेर वही बेज़ारी

जब तक कुछ है पास तुम्हारे , जगवाले पीछे रहते
पेड़ से ठूंठ बने जिस दिन तुम क्या रखे तुमसे रिश्ते
आग लगा देगा बेटा ही, पीछे चल दे संसारी

बंद मुठ्ठी भी थी खाली, खुली हथेली भी खाली
जेब नही कोई भी कफन में, झूठी बगिया सच्चा माली
फिर भी सब खुश है इसमें, नींद में चलना बीमारी

पंचतत्व के पुतले अपने, फिर एक कमी और बेगाने
राहगीर है सभी यहाँ पर, बस सत्य यहां आना जाना
सोचो जैसे लाइन में लगे, नंबर अगला किसकी बारी

शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

न्यौछावर मत करना

दुनिया मे दो लोग तुम्हे जान से भी प्यारे है
एक तो पापा तुम्हारे मगर दूसरा कौन है
हम से क्यूं हिचकिचाते हो बताने में
आखिर क्यों, सवाल का जवाब, मौन है

उसके शौक, आदत, रंग ढंग,
और कितना कुछ यूं ही बताते रहते हो मुझे
बातों में बस बो ही वो तुम्हारे पर
पर्दे में ढका चेहरा नही, पर्दा दिखाते रहते हो मुझे

मेरे चुटकुले भी अब खुलकर हंसा नही पाते 
मगर खुद बेसाख्ता मुस्कुराने लगते हो
पता नही, ऐसा क्या है उसमें ख़ास जो
आजकल बड़ा महके महके से रहते हो

पहले तो मेरे आने से पहले तुम जान जाती 
पर अब तो मेरे जाने का भी ख्याल नही
प्यार के निरे नशे में हो जैसे
मेरी तो मेरी खुद की भी देखभाल नही

एकटक मुझे देख रही हो जैसे
 मुझमे भी उसकी ही तलाशी हो
कोई राज सा लगता है हँसने में 
जब पूछता हूं और मेरी लाडो कैसी हो

मेरी दोस्ती है वो जो तुम कहो तो
रात या दिन नही देखेगी तेरे लिए
कोई वादा नही, ना सही, फिर भी
यारी मेरी, कोई शर्त नही रखेगी तेरे लिए

मैं नही कहता प्यार मत करो उससे
बस एक तरफा मत करना
मेरी जान है तुम्हारी भोली हंसी में
प्लीज हाथ जोड़ता हूँ, उस पर न्यौछावर मत करना

प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना

मुई

मैं कैसे कहूँ जिंदगी अच्छी थी या बुरी
बहुत बेतरतीव गुजरी जितनी भी गुजरी

मनचाहा तो किसी को भी नही मिलता यहाँ

मलाल तो ये है मुई जिंदगी जिंदगी सी नही गुजरी

सोमवार, 26 जुलाई 2021

भोले

बूँद को सागर से बात करनी है
मेरा मन नही मेरा नही तुम्हारी नगरी है
भोले मुझ अज्ञानी का हाथ मत छोड़ना
एक डोर है कठपुतली में, वो भी तुमसे जुड़ी है

भस्म का श्रृंगार, भांग का प्याला
और भी बहुत कुछ है इंतजार में
भूत पिशाच चांडाल भी कितना रो रहे है
 भूतेश्वर के इंतजार में
अब देर न करो सावन हाथ जोड़े खड़ा है
कितनी हिलोरें बैठी है उसके मन मे

महादेव

जटाधारी बाबा तुम्हारा
एक और शरणागत आ गया
दर्शन का बड़ा प्यासा हूँ
एक बूंद को तरसा गया
वैसे तो मुझे मेरे महादेव दिल मे रखने है पर
सावन की झमाझम पर मेरे शिव का दिल आ गया

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

मुँहचैट

निखट्टू को थोडा सुंदर क्या बना दिया
देखो तो इसमें कितनी ऐंठ है
कितना मासूम मुँह है मेरे सोना का
पर मुआ कितना मुँहचैट है
जब मुस्कुराना ही नही था मुझे देखकर फिर
खुदा से लिए ही क्यों इसने इतने प्यारे होंठ है
अब तक तो अंधा भी, मेरी आँखों मे प्यार है जान जाता
मुझे तो लगता मेरे जानू की आंखों में ही खोंट है

रविवार, 18 जुलाई 2021

बिन त्याग

बिन त्याग सभी को इस युग मे
अधिकार अधिकतम करना है
किसी को राम नही रहना
बस परसुराम ही बनना है

छोड़ना किसी को पसंद नही
थाली में एक कौर भी किसी के लिए
पर रोटियां किसको कितनी, तय करना 
ये शगल सभी को करना है

सेवा नही अब , व्यापार से कम
इंसानों का मेला, दुकानों का संगम
वनवास में किसी को नही तपना
सीधे अयोध्या पर राज करना है

संघर्ष की चटनी कौन पीसे मेहनत के सिलबट्टे से
कौन जमीर की आग जलाए दिल मे अंगगट्टे से
सबको डिब्बा बंद गफलत की लत लग गई है जैसे
किसी को किसी का इंतजार कब करना है

घर रहे तो राम थे, वन गए तो पुरुषोत्तम 
भगवान कहलाये क्योंकि सब सहने का था दम
अब सिर्फ नाम रखे जाते है राम के
जब युद्ध नही लड़ा तो तमगों का भी क्या करना है

शहर का तजुर्बा

इस शहर ने मुझे क्या क्या सिखाया है
मैं जब जब भी गिरा ये मुस्कुराया है
कभी छत ढूंढता था सिर ढकने को छोटी सी
अब तो फुरसत नही रुकने की, कैसा काम आया है

नए रास्तो से डरकर निकलता था कभी
रोशनी कर चेहरों से इंसान पहचानता था सभी
आज रास्ते पैरों से और इंसान कीमत से पहचानता हूं
बहुत देर में, वक़्त गुजरते गुजरते ऐसा मुकाम आया है

मुझे दर्द होता था गॉंव में कोई भी बीमार हो
सहने का तजुर्बा न था किसी पर वक़्त की मार हो
अब अर्थी भी पास से गुजरे तो फोन रखता नही
इस शहर ने शहरी होने का ऐसा नशा सुंघाया है

इस्तेमाल करो सबको या हो जाओ
जब तक काम न निकले, मंडराओ
मक्खी से फेंके जाओगे इसलिए काम के बने रहो
बस इसलिए पुर्जा पुर्जा काम मे लगाया है

जो दिखता है वो बिकता है, तजुर्बा किया मैंने
कंधे पर चढ़कर और ऊंचा होने दिया मैंने
चढ़ने वाले ने जब मेरे सिर पर ठीकरा फोड़ दिया
तब पहली बार किसी साथी को औंधे मुँह गिराया है

पैसा पावर और पागलपन अहम का
कैसा नशा है, अपना मजा है वहम का
रास आने लगा है, शहर सिनेमा सा चल रहा आंखों में
मैंने वो सब देखा है जो जो इसने मुझे दिखाया है

अब शहर से कोई गिला नही है कि
मैं जब भी गिरा ये मुस्कुराया है।
शहर के एहसान गांव से ज्यादा है इसलिए
लड़ जाता हूं किसी ने मुझे देहाती बताया है

प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना

जमाना

वो भी क्या जमाना था जब लोग
सलाम करने का सलीका जानते थे
अपनी सी बात करते थे वो और
अपनेपन का मतलब भी जानते थे
अब सिर्फ मतलब की है दुनिया
वक़्त निकले तो पूछते है क्या आप पुरानी पहचान के थे






शर्माजी के अनुभव : बलात्कारी का बाप

मन्दिर की सीढ़ियों पर आज मैं टकरा गया
कोई जो बैठा था अंजान, घबरा गया
हम दोनों ही माफी मांग रहे थे आपस मे
अनायास, रंग ढंग उनका नाम याद करा गया

सज्जन का बेटा मेरे बेटे के साथ पढ़ा था
उनको यहाँ देख मुझको अचरज बड़ा था
मैं बोला भाईसाहब साथ चले क्या मंदिर में
न जाने इतना सज्जन व्यक्ति किस गम में गड़ा था

पहचानकर, बोले आप हो आइये मैं यही रुकूँगा
मेरी कट्टी है जरा भगवान से, इससे आगे नही चढूगा
मैं भी जल्दी ही जाकर लौट आया दर्शन कर
चलिए घर चले आपके साथ चाय पर गपशप करूँगा

हम पैदल ही चले आये अब घर मे हम ही थे
आज पता नही क्यों वो ज्यादातर चुप ही थे
मुझे खल गई खामोशी तो पूछा बेटा कैसा है आपका
लगा मेरे शब्द उनके लिए जहर बुझे तीर ही थे

उफन उठा दर्द का सैलाब आँखों मे उनके
धागा टूट गया और बिखर उठे आंसू के मनके
मुझे याद आ गया उनका उनके बेटे के लिए प्यार
पर कई सवाल मन मे मेरे अब भी थे अनसुलझे

बोले जाने कैसे एक रावण पैदा हो गया मेरे घर
मान सम्मान अभिमान साथ अपने ले गया वो जर
मैंने लक्ष्मण रेखा कितनी ही खींची संस्कारो की
पाप के पुष्पक पर चला गया इज्जत की अर्थी लेकर

सुनता हूं अब जेल में सर पटक कर रोता है
बाप हूँ न सुनकर दिल मे दर्द अटक कर होता है
पाप उसका ही है या मैं भी दोषी तो नही
कैसे कह दूँ वही मिलता है सबको जो बोता है

मैं उसकी माँ बहन से कहता हूं भूल जाओ उसे
मर गया वो अपने लिए मन से मारकर वहा दो उसे
पर खुद ब खुद आँखे निचुड़ उठती है मेरी
आखिर हमने ही पाल पोस कर बड़ा किया जो उसे

कई बार सोचा जेल में चला जाऊं उससे मिलने
जीते रहो ना कह पाऊंगा अब, गर लगा पैर छूने
हिम्मत टूट गई है मेरी, अब कैसे जिंदा रहूँगा मैं
उस बेटे का बाप होना, मेरी सांसे भी कैसे कबूले

लगे सना हर लड़की का चेहरा, मेरे बेटे का ही खून है
मुझे नही पता, इज्जत लूटना किसी की, कैसा जुनून है
बलात्कार होकर अब मैं भी जानता हूं कैसा लगता है
नंगे बदन खड़ा हूँ जैसे, और सामने बाजार का हुजूम है

हर बच्ची के पैर धोकर पियूँ, क्या कालिख धुल पाएगी
जब हर बेटी का अपराधी हूँ, क्या माफी मिल पायेगी
मैं जानता हूं संपोला वो है तो सांप मैं भी तो हूँ
इस बलात्कारी के बाप को कैसे मुक्ति मिल पाएगी
इस बलात्कारी के बाप को कैसे मुक्ति मिल पाएगी

उनके दर्द से मैं भी पिघल गया
मेरा दिल कुछ पल के लिए जैसे गल गया
मैं बोला जो हुआ उसकी सजा एक उम्र से बड़ी है
सच मे बेटा अंधेरे की गर्त में फिसल गया

पर आप चाहे तो ये पाप का बोझ कम होगा
जिस बेटी से गलत हुआ, जब उसको न्यायसुगम होगा
हर बेटी को सम्मान मिलेगा तब ही दुनिया मे
जब बेटे के बापों मे ध्रतराष्ट्रपना कम होगा

कुछ भी नही

अगर मरने से पहले जीना सीख गए तो अच्छा है
वरना जिंदगी कड़वी दवाई से ज्यादा कुछ भी नही
घर बार इज्जत पैसा सबका वादा है मगर
ये कब तक है इस वादे का वादा कुछ भी नही



प्रेम हेतु नम्य

दृश्य: कामदेव भस्मीभूत है, रति भस्म के पास बैठी शिव को संबोधित कर रही है।

हे विश्वनाथ, क्या मेरे नाथ अक्षम्य थे
प्रेम और बस प्रेम हेतु ही तो नम्य थे
बिन आज्ञा, अपने प्रभु से कुछ चाहना पाप है क्या
क्या मेरे कामदेव के कर्म इतने जघन्य थे

माना सर्वेश्वर आप हम सब के स्वामी हो
मेरे देव ने चाहा बस आप उमा के स्वामी हो
हे देवो के देव, क्या संतुलन प्रकृति में आवश्यक नही
क्या सही नही अब, शिव शक्ति संगामी हो

विरक्त अगर पिता पुत्रो से हो जाये
कैसा दुर्भाग्य होगा उन पुत्रों का हाये
आप तो सदा से परमपिता है इस नश्वर जगत के
फिर आप कैसे चाहेंगे, बच्चे बिन माँ के रह जाये

मैं रति, अधूरी हूँ उन बिन
आपकी इच्छा से होता क्या रात क्या दिन
दासी की विनती है, या उन्हें लौटाए मुझे
या मुझे भी भस्मीभूत करें इसी क्षिण

अंतिम शब्द है मेरे, प्रेम की पूंजी छीन रहे है सब से
सती बिन जी रहे है, क्रोध में जल रहे है कब से
हे भोलेनाथ, जिस विरह में आप है मैं भी तो हूँ अब
क्या मेरा दर्द किंचित भी पृथक आपके दुख से

मेरे देव चले गए, कैसे अतृप्त को अब सिक्त करें
हे त्रिनेत्र, मुझे जीव बंधन से मुक्त करें
हम धन्य हुए ये जो भी हुआ, मेरा जन्म सफल हुआ
प्रेम हेतु जी लिये, दीनानाथ प्रेम प्रवाह में विमुक्त करें



बुधवार, 14 जुलाई 2021

मैं इंसान हूँ

विकसित समाज में
सम आज कुछ कहाँ रहे
फासलों का दौर है आया
जरूरी है दूरी, समझा रहे
भाव की पर्ची लिए फिरते है लोग
तख्त जितना ऊँचा, सर उतना झुका रहे
कागज का टुकड़ा था कभी पैसा
उस हाथों के मैल से ईमान सजा रहे
अब वो बात कहां इंसानों में
नींद के लिए तक तो गोली खा रहे
मौसमी बारिश हुए दशक गुजरे
फिर भी मौसम समाचार भविष्य बता रहे
हम उलझे है ऐसे खुद से जैसे
आखरी सांस तक सिरे मिला रहे
माँ बाप आश्रम में छोड़े और बीबी को घर मे
बच्चों को उनके कल का सपना दिखा रहे
नाक इतनी ऊँची है, मक्खी भी नही पहुंचेगी
पर गरीब तो मक्खी के साथ खाना तक खा रहे
बच्चे नही, अमीरी के ख्वाब जाते है स्कूल
सब बेचकर पैसा खरीदो, सिखा रहे
हर किसी का काम बंटा है फायदे से
औरत सामान दिखा रहीं, मर्द घर पहुंचा रहे
कोई कीड़ा ही होगा पिछली पीढ़ी को काटा
आज इंसान इंसान को मशीन बना रहे
नादान रहने दो मुझे समझदार नही होना
मेरा गुरुर मैं इंसान हूँ, बस ये बना रहे

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

विरहाकुल साधू

दृश्य: सती भस्म लपेटे महादेव वन वन विचर कर विचार कर रहे है

विरहाकुल साधू हूँ
कहाँ तक आ गया हूं मैं
क्यों प्रतिध्वनित हृदय है मेरा
एकांत वन में अदृश्य साथी पा गया हूं मैं

तज दिया वियोग में सब
जो पाया या बनाया मैंने
ओ सती, बस इतना बता दो
क्या प्रेमवंधन ठीक निभाया था मैंने

मैंने शमशान देखे
अशांत कोई स्वर न हुआ वहाँ
भूतेस्वर हूं मैं तो क्या
सत से तृप्त किंचित न हुआ वहाँ

जोग सिखाता था मैं उसे
सती योग सिखाती थी मुझे
उसके जाने के बाद पता नही क्यों
विरक्ति शिक्षा भी झूठा बताती थी मुझे

मैंने कहा प्रिय सती
प्रेम और साधना एक कभी नही हुए
सती का उत्तर था संयुक्त है नाथ ये
विमुक्त ही कभी नही हुए

कोई साधक ही नही
जिसने स्व साधना से प्रेम ही न किया
अन्यथा न लेना नटसम्राट
दीक्षा दें यदि कोई नृत्य राग बिन किया

ओ सती तुम्हारी बात का
अब मर्म जानता हूं मैं
तुम्हारे प्रेम बिन अब कोई साधना
बेअर्थ मानता हूं मैं




बुधवार, 23 जून 2021

नादान

मुझको ग़लतफ़हमी हो गई कि
तुझको तुझसे ज्यादा जानता हूं मैं
अब तो मुझे अपने दिल पर तरस आता है
उस नादान ने बताया भी नही,तुझे क्या मानता हूं मैं
दिल बैठ कर मेरे सिरहाने, तेरा जिक्र करने से डरने लगा
फिर से न कह दूँ अब बस, उसे अच्छे से जानता हूं मैं

क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं

देखकर मुस्कुराते भी नही
क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं
हर बार आप-आप कहती हो
सच्ची, इतना बड़ा हो गया हूं मैं
बचपन मे तो छोटी रजाई इतनी लंबी बातें थी तेरी
अपने पैरों पर खड़े होने से तन्हा सा हो गया हूं मैं

रश्क खाते थे दोस्त मेरे
जब हम साथ चलते थे
कितने अच्छे थे दिन
तेरे गम मेरी खुशी से गले मिलते थे
अब तेरी चुप्पी मेरे दिल में चीखती चिल्लाती है
कभी क्या था तेरे लिए, अब क्या हो गया हूँ मैं

कभी दो पल बैठ जा, इल्तजा है
इतनी दूरी, ऐसी क्या वजह है
तेरे चेहरे पर जिसने पहले की रंगत देखी हो
उसको बेनूर देख कर, कितनी बार मर गया हूं मैं

माना मैं तेरा सगा नही कोई
पर सच मान दिल मे दगा नही कोई
ले मेरा सर झुका है तेरे आगे, थाम ले या काट दे
मैं तेरा दोस्त नही फिर, जो उफ भी कर गया हूँ मैं

ए खुदा, किसी को ऐसा बचपन न दे
बचपन दे तो ऐसी दोस्त ना दे
दोस्त दे तो फिर छूटने की वजह न दे
वजह दे तो फिर जिंदगी ना दे

मैंने जिस की खुशी के लिए, जिंदगी उधार की तुझसे
क्यों उसकी एक हंसी के लिए तरस गया हूं मैं



प्यार का लिफाफा

जिंदगी के पन्नो पर मुस्कुराहट का जिक्र तक नही 

तुम आये तो बंजर में कलियाँ चटक गई

अब तक किसी को मेरी फिक्र तक नही

तुम आये तो हमपर सभी नजरें टिक गई

आंखे लड़ी तो डर गए, प्यार का लिफाफा खुल न जाये

इसलिए नजरें बचाई मगर पलके झुक गई

मंगलवार, 22 जून 2021

कितना बुद्धू हूँ मैं

कितने बुद्धू हो तुम 
मुझे पहले से पता था कि तुम्हे पता नही है फिर भी तुमसे पता करने को कहकर पता कर रही थी कि तुम्हे कुछ पता है या नही, अब पता चला तुम्हें!!!
अब तक मुझे पता लग गया था कि मैं कितना बुद्धू हूँ

नींदे तक चली गई

कहते है अपनो को सीने से लगाओ
तो आराम आ जाता है
हमने अपना समझ लगाया तो नींदें तक चली गई


शॉर्ट्स

जिंदगी अगर चार दिन की है
तो एक दिन के लिए हमारे हो जाओ
यकीं है मुझे, उसके बाद तुम गिनती भूल जाओगे

इतनी बाते सीने में छुपा कैसे पाते हो
यहाँ तो थोड़ी सी सांस के बाद हवा को भी जगह नही रहती

कितना मुश्किल होता है 
अपनी मोहब्बत से दूर रहना
उससे भी मुश्किल होता है
आपको मोहब्बत करने वाले को दूर करना

छोटे छोटे ख्वाब बुने थे आपके
बेसब्री इतनी थी आज आपसे मिलने की
बस दो शब्द ही कहने थे आपसे लेकिन
महीनों तक डॉक्टरी की थी आपसे कहने की


तुम भी बेताब थी मैं भी बेसब्र सा
और लोग किसी धुएं के इंतजार में
मैंने तुमको देखा,तुम मुस्कुरा गई
लो आज आ गई खबर अखबार में

बहरहाल लोग सूंघ रहे है मजनूँ का पता
एक हम है उसकी फुरकत को सीने से लगाये बैठे है
यकीं होता नही देखकर भी उनको
एक वो है मेहंदी फुरसत से हाथों में सजाये बैठे है

एक दिल दिया था खुदा ने ,उसको भी गुमा दिया
करवटें बदलते है अब, उफ क्या गुनाह किया
खराब कर ली छोटी सी जिंदगी
छोटे तिल के चक्कर मे कीमती दिल भुला दिया

बदनामो के सरताज थे हम,
उनकी गली में गुजरते गुजरते आम हो गए
बस देखते थे खिड़की से हमे
इसलिए वो मेरे नाम से बदनाम हो गए















रविवार, 20 जून 2021

पलायन का दर्द

लौट कर चले आये
वहाँ रह कर भी क्या करते
कोई अपना नही हो जहाँ
वहाँ मर कर भी क्या करते

लोग दूर से पूछते थे, कैसे हो भाई
थक गए अपना हाल समझाते, क्या करते

रास्ता,मंजिल तरीका सब पता था मगर
पता नही था दूरी इतनी हो जायेगी, क्या करते

सिवा हमारे दुनिया ही घर मे बैठी थी
दुखी थे सभी, हम दुख के अचार का क्या करते

जिंदगी छोटी सी है, इसलिए छोटे खाब देखे थे
पर रात इतनी लंबी हो गई, भला क्या करते

मुँह देखने को तरस गए अपनो का
मौत की सवारी भी मिली चढ़ लिए, क्या करते

माँ के आंसू, बहन की राखी, बीवी की चूड़ियां
कितना कुछ छुप गया आंसुओं में, क्या करते

सोचते थे सुबह आएगी कोई, पर 
दिलासे भी दिल से कहाँ लगते थे, क्या करते

लौट कर चले आये भला क्या करते




मेरे बाबू जी

जिसके बिना मेरा नाम अधूरा
जिसके साथ मेरा परिवार पूरा

वो छत है बाकी सब दीवारें है
एक उसने पूरे घर के सपने सँवारे है

वो माँ से कम दिखते है घर मे
कितना कुछ कह देते है छोटी छोटी बातों में

उनके हाथों से बहुत मार खाई है
सख्ती में भी उनके प्यार की मिठाई है

बहन को कितना ज्यादा प्यार जताते है
इसी तरह नारी की इज्जत करना सिखाते है

कुछ पैसो को देने के लिये कितना टहलाते है
दुनिया मे पैसो की अहमियत इसी तरह बताते है

उन्हें कुछ पता नही होता, पूछते है शाम को माँ से
फिर भी बचा लेते है, इस काटो भरे जहाँ से

और कुछ नही बस कहना इतना है
मुझे बड़े होकर बस उनके जैसा बनना है

शनिवार, 19 जून 2021

अकड़ू

प्यार के सिवा मुझे कुछ नही आना है
उसकी नाक पर गुस्से का ठिकाना है
समझाऊँ कैसे अकड़ू को, कहता है
दूर से ही बताओ तुमको जो बताना है

शुक्रवार, 18 जून 2021

प्रेम किया नही मुझे हुआ

सती शिव संबाद प्रथम मिलन

माना तुमने मुझसे प्रेम किया
प्रेम ने मेरा भी मन छू लिया

एक फ़क़ीर हूँ मैं, जानती हो ना

तुम्हारा क्या भविष्य हुआ
मेरे साथ बस धुआं ही धुआं

मैं वन का घुमक्कड़ साधू 
मेरे पास कुछ नही ,तुम्हे क्या दूँ

तुम दक्षसुता हो, मानती हो ना

फिर भी कैसा भूत सवार किया
निज मात पिता का विचार किया

मुझे सुख और दुख माटी के समान 
मेरे पग में कंकर को पुष्पो का मान

क्या कोमल हृदय से बैराग्य चाहती हो ना

जाओ सब भूलकर, अब तक जो किया सो किया
भूल जाना कभी तुमने किसी से प्रेम किया

हे नाथ, आप का आदेश सर माथे
मैं लौट जाउंगी, अपना मत बता के

विरक्ति का विधान चाहते है ना

मैं भूल जाउंगी, अब तक जो हुआ सो हुआ
सिवा इसके की मुझे आपसे प्रेम हुआ

मैंने दिन नही क्षण जिये है आपके लिए
मैं प्यासी भटक रही कब से, एक बूंद प्रेम का पिये

समस्या का समाधान चाहते है ना

मैं समस्या नही हूँ, संगिनी रहूंगी
राग आपका अन्यथा बैरागनी रहूंगी

माना आप अंतहीन हो बिश्वेस्वर
प्रेम मेरी स्वांस है नही कोई ज्वर

कितने त्याग किये अब एक और चाहते है ना

ऐश्वर्य, महल, परिवार सब तज दिए
प्रेम परीक्षा के लिए सब व्रत लिए

बस यही तक आप मेरे थे दुख नही
पर मैं आपकी रहूंगी सदा सत्य यही

मैं सती हूँ सती, अगर मेरे प्रेम में सत है ना

तो अब मैं नही आप कहोगे प्रेम से प्रेम हुआ
क्योंकि मैंने प्रेम किया नही आपसे प्रेम हुआ



गुरुवार, 17 जून 2021

जुदा

मेरा महबूब थोड़ा जुदा है सबसे,
गुस्सा करके भी सब छुपा लेता है
वो जानता है हम तड़प कर रह जाएंगे
रूठे तो मुस्कान जरा कम देता है

बुधवार, 16 जून 2021

बदनाम

एक शाम को जो उसके नाम कर दिया
इस गुनाह पर गुमनाम को शहर ने बदनाम कर दिया
नम आंखो ने मुस्कुरा कर कहा मुझे, अब और कुछ नही
तूने मेरे साथ बदनाम होके मेरा काम कर दिया

सोमवार, 14 जून 2021

एक और दीवाना

बड़ी दूर से आये थे नजारा करने
तेरी झलक भर से जिंदगी का गुजारा करने
तुम अपने गुरुर से बौने रहे और हंस दिए
एक और दीवाना आ गया बंजारा बनने

मंगलवार, 8 जून 2021

शर्माजी के अनुभव : पराश्रित

ढलती शाम और पार्क का किनारा
सुकून की तलाश में बैठा मैं बेचारा
स्वार्थियों के हुजूम दुनिया मे छाये है
दर्द सुनना भी अब एक व्यवसाय है
मेरी तरह तन्हा है, पर चिड़िया तो गाती है
क्या जिंदगी है, खाती है, पीती है, सो जाती है
एक मैं हूँ जो सुकून के लिए भी पराश्रित 
अभी कुछ हुआ जिसे देखकर मैं था चकित
एक वृद्ध आये मेरे पास ही आकर बैठे
हम दोनों ही चुप थे मैं आदतन वो दुख सहते
देखकर लगा जैसे छू लूं तो रो देंगे अभी
दुख बढ़ता गया हो और कंधा नही मिला कभी
हिम्मत जुटा कर पूछ लेना चाहता था मैं
कि तभी एक छोटी गेंद ने चौका दिया हमें
कुछ पल बाद एक नन्ही परी आई
बच्ची से नजर मेरी हट नही पाई
बोली मेरी बॉल लेने आई हूँ मैं
कहकर जैसे शहद घोल दिया हो कानो में
बॉल लेकर वृद्ध की आंखों में झांक गई 
रो रहे है अंकल, कहकर आंखे नही दिल तक भांप गई
वृद्ध फफक पड़े उसके कदमो में सर रखकर 
बच्ची भी रो रही थी साथ उनका सिर सहलाकर
कुछ पल में गुबार जब ठंडा हो लिया 
बोले जाओ खेलो अब मैं ठीक हूँ बिटिया
छुटकी चली गई मुस्कुराकर
वृद्ध अब ठीक थे किसी बोझ को बहाकर
हिम्मत कर पूछ लिया मैंने चाचा क्या मिला आंसू बहाकर
बोले अभी लौटा हूँ मैं जन्नत तक जाकर
जरा खुलकर कहिए चाचा, मैं कुछ समझा नही
बोले ये आंसू प्यार थे मेरी बेटी को जो कभी पहुंचे नही
चाचा क्या बेटी आपकी बहुत दूर गई
बोले अरे नही वो अपने घर से भाग गई
ये आंसू संभाले थे उसकी बिदाई के लिए
इन्हें साथ लेकर अब बूढ़ा कैसे जिये
आंसू नही थे बोझ थे मुझको थकाते थे
प्यार कम रह गया मेरा हर वक़्त जताते थे
अब स्वतंत्र है वो तो पराश्रित मैं भी नही
इस अर्थहीन पानी का अर्थ कुछ भी नही





शर्माजी के अनुभव: मातृत्व

ढलता अंधेरा और काली सी महिला
बाजार किनारे खड़ी, हाथों में थैला
अजनवी थी मगर कुछ अलग था चेहरे में
जैसे खुशी खड़ी हो उदासी के पहरे में
बढ़ने लगा तो आवाज आई 
कहाँ तक जा रहे हो भाई
मुड़कर कहा आपको कहाँ जाना है
मेरा तो गोविंद नगर में ठिकाना है
बोली मेरी मदद कर दीजिये
बड़ी कृपा होगी साथ ले लीजिये
मैंने कहा बैठिये, कृपा की कोई बात नही 
वैसे भी आज खाली है बाइक, कोई साथ नही
लेकर उसको चल दिया, हम चुप ही रहे
वैसे भी कुछ नया नही था, कोई क्या कहे
कुछ देर बाद शुक्रिया कर उतर गई वो
आगे जाकर जेब टटोली कुछ ख़रीदने को 
चौंक गया मैं, कटी जेब मे पैसे नही थे
पूछता था दुकानदार लाये भी थे, या नही थे
आज पहली बार मुझे मदद पर पछतावा हुआ
बड़ा नुकसान नही था चलो जो हुआ सो हुआ
गुजरता गया वक़्त मैं अब हर किसी को बताता
नेकी मत करो देखो, मुझको बुरी दुनिया का पता था
एक दिन फिर वही हुआ, जो हो चुका था पहले
मेरी पहचान ना कर पाई वो, था "हेलमेट" पहने
फिर वैसे ही ले जाकर उतार दिया उसको
मेरा गुस्सा ले गया लग लिया उसके पीछे को
कुछ दूर जाकर झोपड़ी में घुस गई चलते चलते
सच ही है चोरों के महल नही चुना करते
मैं भी झोपड़ी में चल दिया कुछ कर गुजरने को
मैं रह गया अवाक, देख मुझे चौंक गई वो
बच्चे को चम्मच से दूध पिला रही थी
मैं देख रहा बच्चा, वो मुझे देख रही थी
पूछा बाबू साहब, आपको क्या चाहिए
मैंने भी कह दिया, चोरी का हिसाब लाइये
सकपकाकर पैर पकड़, वो रो दी ऐसे
एक माँ नही हो, कोई बच्ची हो जैसे
मैंने कहा काम करो, हाथ पैर साबित है
बच्चे को भी चोर बनाओगी या तेरी आदत है
महिला ने कहा मैं चोर नही बाबू साहब
बताती हूँ मेरे साथ जो हुआ है सब
ये बच्चा मेरा नही, ये सहेली का है
मुझको समझ नही आया ये पहेली क्या है
आगे बोली सहेली तो मर गई बैसे
आखिर बलात्कार झेलकर जीती कैसे
बस तब से इसे पाल रही हूँ जैसे तैसे
काम पर जाने से डरती हूँ, कही मर न जाऊँ सहेली जैसे
इसीलिए ही मैं चोरी भी करती हूँ
बिन ब्याही माँ हूँ न, दुनिया से डरती हूँ
आंसू नही रोक पाया मैं ये हाल देखकर
माँ आखिर माँ होती है, कैसी भी हो रो दिया कहकर


शुक्रवार, 4 जून 2021

बहना की पाती

प्रिय भैया

लिवा ले जाओ न आकर
तुम्हारी याद आती है
यहाँ खुश हूं बहुत लेकिन
मुझे खुशियां रुलाती है
जबसे आई हूं रोती हु कमरा बंद कर करके
कोई आता है तो होंठो में सिसकी सिल जाती है
पूरा दिन झोंक देती हूं चूल्हे की आग में लेकिन
क्या करूँ अम्मा मेरे सपने में आती  है
याद नही आता यहाँ कब किस्से रूठी थी
मेरी चूड़ियां मनाती है पायल समझाती है
कन्यादान हो आई यहाँ अपने बनाने को
तेरी तस्वीर ही भैया मुझे अपना बताती है
यहाँ सब अच्छे है लेकिन कोई बात है ऐसी 
अपना होने में और बनने में अंतर जताती है
अम्मा ने कहा था आते समय भैया को भेजूंगी
क्या बिगाड़ा था उनका हाय मुझको भुलाती है
चाहिये कुछ नही मुझको मैं जल्दी लौट जाऊंगी 
एक बार लिवाने आओ न मुझे यादे बहुत रुलाती है

                                            तुम्हारी अपनी बहन

गुरुवार, 3 जून 2021

मगरूर

 उनको अपना कहते कहते हम अपनो से दूर हुए
मिलने मुझसे ना आये वो कितने वो मगरूर हुए
दर दर दौड़े घर घर भटके पता पूछने हम उनका
वो न जाने इस चक्कर मे  कितने हम मज़बूर हुए

एक बूंद इश्क

अजी थोड़ी देर तो बैठो इससे तुम्हारा क्या जाएगा
मेरा दिल जो बैठा जाता है संभल जाएगा
यू पल भर आकर बेरुखी से उठ चल देते हो
मेरे दर्द को समझने का हुनर तुमको कब आएगा
वक़्त लेकर आना अबकी बार, बातें कर ले दो
ऐसे तो हर सवाल मेरे दिल मे ही मर जायेगा
खताबार हूँ तो ये लो मेरा सर तेरे आगे है
कर लो वो जो तुम्हारे दिल मे आएगा
मैं नौकरानी हूँ तेरे प्यार की, गुलाम नही तेरी
मेरा प्यार तुझ सा नही, साथ आया फिर चला जायेगा
हम तुम बैठेंगे साथ तो जमाना जलेगा ही
मलाल होगा जिसको वो तो बस बड़बड़ायेगा
मैं तेरे लिए तू मेरे लिए ही बना है देख
इतनी सी बात समझने में वक़्त कितना लगाएगा
मिन्नते कर रही हूँ आज, कल किसने देखा
बाद तरसोगे एक बूँद इश्क को, ना कही आराम आएगा


मैं इंजीनियर तो हु

मैं इंजीनियर तो हु पगली
टूटा दिल फिर भी मैं जोड़ नही पाता
तू तो फिरती थी बड़ी डॉक्टर बनी लाडो
मेरे नाम का कांटा तुझसे निकाला नही जाता
तू मुझे संगदिल कहे तो भी
तेरा हाथ मुझसे तो छुड़ाया नही जाता
तू रूठ जाती है बात बात पर
एक मैं हु जिससे मनाया नही जाता
इंजीनियरी ही क्या सब बेकार है पढ़ा
तू ठीक कहती बुद्धू हू मुझे कुछ भी नही आता




तुम मेरे क्या हो

दृश्य : नायिका के हाथ मे तस्वीर है और अपना हाल बता रही है ।

कैसे कहूँ मैं तुमसे कि तुम मेरे क्या हो
मैं तुमको क्या बताऊँ, जब खुद ही न पता हो
कुछ खो गया है मेरा तेरे आने से 
देखो, तुमको अगर मिला हो तो बता दो

सभी कहते है, मै बदली बदली सी हूँ
कुछ तो हुआ जरूर है, कमली कमली सी हूँ
बात करती हूं तो लगता है, कुछ भूल रही हूँ शायद
याद करती हूँ क्या, तुमको कुछ हो 'आइडिया' तो बता दो

नीद छोड़कर तारे गिनना भाने लगा है मुझे
हर समय कुछ गुनगुनाना आने लगा है मुझे
दरवाजा पड़ोसी का भी बजे तो उठ आती हूँ
इंतजार किसका है, उसे पहचानते हो तो बता दो

रसोई में भेजती नही मम्मी, उंगली जला लेती हूँ
लड़ने में मजा नही रहा भाई से, गाल सहला देती हूँ
पापा कहते है लगता है इसे भर्ती कराना होगा
क्या मैं बीमार हूँ, तुम क्या मानते हो बता दो

तुम जब अजनबी थे तो ही अच्छे थे
कम बोलते थे, मगर सच्चे थे
अब मैं ही बकबक करती हूँ तुमसे
क्या तुम गूंगे हो, चलो इशारे से ही बता दो

कर्ज चुका दो

दर्द की मेरे दवा हो कोई जान के बदले में दे दो
छोड़ के मुझको जाने वाले कब आओगे ये कह दो
मेरे प्यार की कितनी उधारी अब तक तुमने पाई है
सूद समेत बकाया मेरा जाने से पहले दे दो

माँ रो देती थी

मेरी मां दुनिया की सबसे अच्छी माँ है
मैं ये जब कहता था तो माँ रो देती थी
मैं अपनी नींद तक ढूंढ नही पाता खुद से
उंगलियों से मेरे बालों में माँ उसको ढूंढ देती थी
दूर जाता था तो माँ के आंसू देखे थे मैंने
घर मे आता था तो हँस के माँ रो देती थी
कभी चोट लगती थी मुझको बताता नही था मैं
देखकर मुझको न जाने क्यों माँ रो देती थी
जान नही पाया इतने आंसू कहाँ से लाती थी वो
मैं पूछता था माँ से तो माँ रो देती थी
आज जब बाप बना रो दिया मैं देखकर नन्ही जान को
अब मैं जानता हूं क्यों माँ रो देती थी

धरती माँ

कुदरत के कानून को तोड़ो मत इन्सान।
तुम दोगे तो ही मिले जीवन का सम्मान।।
ये धरती तेरी नही बस कब्जा कुछ रोज ।
क्यों खोया है स्वपन में रख ले कुछ तो होश।।
जंगल उपवन ये नदी देते जीवन दान ।
वस्त्र फाड़कर भूमि के करता क्यों अपमान।।
धरती माँ ने पालकर कर दिया पूरा फर्ज ।
दूध नही तो गोद का कुछ उतार लें कर्ज।।
पशु और इंसान में कैसे करेगा भेद।
थाली में तू खाय जो उसी में करता छेद।।
मां का आँचल जाने सब माटी नही बेजान।
अपनाए तब भी तुझे छोड़ जाए जब प्राण।।

बुधवार, 2 जून 2021

खुशी की खुदकुशी

तुमने जो दो लफ्जो में कहा, वो मेरी जिंदगी सा है
मैं वो समंदर रहा, जो कुछ कुछ खाली सा है
झंझट लगता है मुस्कुराना तेरे बिन अब तो
हँसना तो जैसे हम पर इक गाली सा है
बाकी दुनिया ने हमे ताने दिए सब छोड़ देते हम
पर कौन जाने तेरा जाना मेरी खुशी की खुदकुशी सा है







सोमवार, 31 मई 2021

वो अनजान बन गए

पल भी क्या अनमोल थे, जो छूट कर तारीख बन गए
लम्हे जो मेरे साथ गुजरे,  वो तेरी तारीफ बन गए
तेरे अपनो के साथ मेरी दुआए भी लगे तुझको
मेरे खत में आँसू गिरकर बरसात बन गए 

उन्हें हम से शिकवा गिला हो, हमको कुछ भी नही
हमसफर जो बन ना पाए तो तेरे मुरीद बन गए

हुजूम उनके आशिको का हमे पीछे छोड़ आया
हम पूजने चले तो वो महलो की जागीर बन गए

कहते थे प्यार करते है जी और जान से
हम जान कहते रह गए वो अनजान बन गए

प्यार की तिजारत

 बुझा बुझा सा कोई है, फिर जलाने को कहता है
याद आने की कितनी बजहे, भूल जाने को कहता है
दिलासा दे के समझाया मगर क्या फिर वही ख्वाहिश
खता मेरी बता दो ओ खुदा हर दिन वो कहता है 

मुझे तो खुद नही था प्यार पर इतना यकीं रहबर
काफिले छूटे कितने ही, हमेशा कौन रहता है

फकत इतनी गुजारिश थी मुझे अपना सनम कह दे
वो झूठा ही सही माना, मगर ये कौन कहता है

सुबह से शाम तक तेरी तिजारत देख ली दिलबर
लेती है गम से वो खुशियां जहाँ में कौन ऐसा है




नारी के बिन

 वो राधा है वो गीता है वो शक्ति है वो सीता है
हर रूप में रंग अनोखा है सब नारी के बिन रीता है
पर हाय रे पतित जगत के रंग, हर रूप कुरूप करे ये ढंग
माँ भगिनी भाभी बेटी ये, जग इनसे चलना सीखा है 

रुनझुन पायल पहने बेटी जब बाहों में इतराती है 
कितना कठोर वो सीना हो अपनेपन से पिघलाती है
क्या इंसानो की दुनिया है बेटी लाने से डरते है
मानो पापों को हर लेती और कोई नही वो दुहिता है
हर रूप में रंग अनोखा है सब नारी के बिन रीता है

उम्र के साथ बड़ी होकर जब हाथो का सहारा बनती है
वो बहन ही होती है बन्धु, जो बिन बोले सब सुनती है
ये कैसे भाई बंधु है जो अपनी पराई करते है
ये है तो रंग है खुशियों में, बिन इनके जीवन फीका है
हर रूप में रंग अनोखा है सब नारी के बिन रीता है

जब यौवन कुछ कर जाता है पुरुषत्व अधूरा पाता है
भार्या बनती है नारी ही, जीवन पूरा हो जाता है
हरियाली है वो धरती पर दुख में खुशियों का बादल है
अंधेरा है सब इसके बिन, हाँ घर का वही उजीता है
हर रूप में रंग अनोखा है सब नारी के बिन रीता है

अब और क्या कहूँ क्या है वो हर शब्द तुच्छ मैं पाता हूं
माँ हो जाती है इतनी बड़ी, बस उंगली तक मैं जाता हूं
हाँ आज हु मैं कल कोई फिर इस दुनिया को समझायेगा
पापी है हम ये गंगाजल, हां नारी परम पुनिता है
हर रूप में रंग अनोखा है सब नारी के बिन रीता है



मंगलवार, 25 मई 2021

ये मेरे साथ साथ रोया है

हर याद को साथ को लम्हे को 
वक़्त ने सूत में पिरोया है
मेरा साथी रहा है दिल मेरा
तेरी खातिर ये मेरे साथ साथ रोया है
तुझे कोई बेबफा कहे तो टीस कैसी है 
तू जब गैर की बाहों में जाके सोया है
नशा तेरा गया तो होश मेरा साथ गया
बुद्धू मेरी तरह है जाके अब ये खोया है
जिक्र तेरा कही न हो ये मेरी फिक्र रही
फिर भी तेरी यादों का कबाड़ ढोया है
वक़्त ने घाव दिए वक़्त ही दवा देगा
दिल से दिल को मैने आंसुओ से धोया है

दिल की दुनिया

नज़र में रहने वाले दिल मे क्यों बस जाते है

जरा छोटे से आंसू गम खुशी में काम आते है

बफा का रास्ता है ये नज़र से दिल की दुनिया का

पलक से  दिल में  चलकर वो बिना पैगाम जाते है



क्यूं रूठ गए तुम

कोई कहता रूठ गए तुम या जाना बहुत जरूरी था
मैं कहता हूं जाना था तो कहना बहुत जरूरी था
ना कहता मैं कह लेती तुम कुछ अपनी यादें तो होती
मुझको तो बस ये कहना था मिलना बहुत जरूरी था

याद है तूझको नाम भी मेरा रेणु से पुछवाया था
बातों बातों में ही अपना नंबर मैं दे आया था
लगा उसी दिन नंबर के सपने अपने दे आया
मिस्ड ना रिंग हो जाये रातों में जगना बहुत जरूरी था

आदत मेरी बदली मेरा शौक भी हर छुड़वाया था
तेरी खातिर दुनिया को मैं चूल्हे में रख आया था
आदत मेरी तुम थी जाना और तुम मेरी सपना थी
हर दिन तुमको जिया था मैंने बस ये ही मुझे जरूरी था

अपने छुटे सपने टूटे घर बाहर सब दूर गया
प्यार हो सच्चा सब मिलता है यही मेरा गुरुर गया
तेरे कारण छोड़ दिया सब अब तुम ही जब छोड़ गए
सांसे आना जाना जिंदा रहना बस मजबूरी था

मुझको तो बस ये कहना है मिलना बहुत जरूरी था

सोमवार, 24 मई 2021

दिल की मर्सडीज

‘ब्यूटी’ की धार तेज बहुत दिख रही मुझे
‘लिप लाइनर’ की कोर चला जा रहा हूँ मैं
इस ‘लाइफ’ की ‘फिज़िक्स’ के ‘मिस्ट्री’ हो तुम
‘प्लस माइनस’ का ‘फोर्स’ खिंचा जा रहा हूँ मैं
दिल समझा था जिस प्यार को पहली ही ‘क्लास’ में
उस दिन का ‘होम वर्क’ किये जा रहा हूँ मैं
नाराज तुम ना होना ‘आई लब यू ‘ना कहूँ
इंग्लिश में हाथ तंग है, बतला रहा हूँ मैं
कोई आये अभी ‘पिंच’ करे बाह पर मुझे
ये सच है, या ‘स्वीट ड्रीम्स’ जिए जा रहा हूँ मैं
कभी घूर कर ना देखा तेरे ‘रोज़ी लिप्स’ को
रब भी कहे ‘वन पीस’ ये बना रहा हूँ मैं
इस जिंदगी के ‘वन वे’ पर तुम साथ में रहना
इस दिल की ‘मर्सडीज़’ में बिठा रहा हूँ मैं

क्या साथ आओगे

अगर उलझे रहे खुद में तो भला क्या बताओगे
मैं जितना दिल लगाऊंगा तुम उतना दिल बचाओगे
मुरव्वत बेमुरव्वत होना मुश्किले है बाद की
इस पहली मुलाकात को सोचो कैसे बिताओगे
माना इश्क तेरा कतरा नही समंदर है
मैं अगर घेर लू बाहों में तो क्या थम जाओगे
अब हमें दूर तक जाना है इन्ही राहों पर
तुम मेरा हाथ थामे बिन थके चल पाओगे
अब तेरे होंठो पर मुस्कान बने रहना है
तो ये बादा रहा मुझको वहां सजाओगे





अमानत

झूमरों की रोशनी भी स्याह होती है तेरे बिन,
तू जो हो तो तपिश भी चांदनी सी लगे।
उलझ गया हु मैं रोक लू तुम्हे या रुक जाऊँ,
ठौर मेरा नही पर जिंदगी ठहरी सी लगे।
रोज तेरी तस्वीर बात करती मगर तू नही,
बात ये राज की सुन तुझको क्यूँ झूठी सी लगे।
पहले पहल होंठो का दीवाना हुआ था मैं ,
अब तेरी हर बात जुदा होके बस तेरी सी लगे।
अभी तू मेरी होके भी मेरी सी नही ,
बस यही बात मेरे दिल पर छुरी सी लगे।
मैं तेरा मजनू हु रांझा हु तू जो भी कहे,
मैं तो कहता हूं मेरी धड़कन में तू धड़क सी लगे।
रात सिमटी थी तेरे गेसुओं में कैद होकर,
इसलिए रात में बस रात की कमी सी लगे।
हम जो मिले तो उस खुदा का कुछ इरादा था,
मुझको तू गैर नही अपनी सी सगी सी लगे।
कोई मुझे रोक ले मिलने से तो मर जाऊंगा,
ये जरा बात मुझे मछली बिन पानी सी लगे।
डूबता तुझमे हु मोहताज सा हु तुझ पर मैं,
ये मेरी जिंदगी बस तेरी अमानत सी लगे।



बहुत पछताओगे

 तुम जा तो रहे हो छोड़कर पछताओगे
सेज मखमल की भी होगी तो न सो पाओगे
यादों का सैलाब आएगा दिल से आंखों तक
इस छोटे से दामन में सैलाब समा पाओगे
माना अभी दोस्त है परिवार और दिल्लगी भी है
ये दर्द कैसा है सीने में सबको क्या बतलाओगे
बहुत यादें है मेरे पास तेरे पास थोड़ी तो होंगी
मेरे एहसास का भरम झूठे दिल से कैसे तोड़ पाओगे
माना टूटा है मेरा दिल क्या तेरा बाकी है
हां मैं जरा बिखरा तो क्या तुम भी सिमट पाओगे

अब बस थक गया कहकर सह लूंगा मैं ये
भूल जाना मुझे और न मैं कह पाऊंगा न तुम सुन पाओगे
चलो अनजान बनकर देखलो पर सुन लो जरा
गर पछताओ और टूट जाए अहम तो कह देना
मैं वो सब सुन लूंगा जो तुम न कह पाओगे
तुम जा तो रहे हो मगर पछताओगे

कैसे कैसे संत

चाचा से कहने लगे द्वार खड़े एक संत,
दे बच्चा प्रभु आये है खुश होंगे भगवंत,
खुश होंगे भगवंत, ग्रहदशा तेरी भारी,
देख लिया स्पष्ठ भाग्य में कमी तुम्हारी 
दशा शनि गंभीर है और राहु काल
हम है पहुचे वहां तक देख लिया सब हाल
देख लिया सब हाल बाबा है जमघट बाले 
रौद्र रूप में जब आये सब फूँक ही डाले
चाचा छज्जु लाल ने सोचा बहुत प्रचंड
जल्दी किया प्रणाम हाथ से ले लिया उनका दंड 
ले लिया उनका दंड दंड को रख कर बोले
 बैठो बाबा आसन पर प्रभु बम बम भोले
बोलो सेवा दास को कर दो मुझको धन्य 
कर बाबा को दंडवत हो गए चाचा नम्य
हो गए चाचा नम्य बस कृपा इतनी कर दो 
भर दो सब भंडार दया बस इतनी कर दो 
बोले आ जा शरण में बाबा हुए प्रसन्न
मत कर चिंता धन धान्य की करेंगे तुझको धन्य
करेंगे तुझको धन्य ज़रा जल पान करा दे
क्या हैं इच्छा तेरी फिर एक लिस्ट बना ले 
चाचा कूदे एक फिट ख़ुशी न मन में समाये
दो कदमो में दौड़ कर चाची लिए उठाये 
चाची लिए उठाये जरा हमको भी बताए
कल तक मोटी भैंस थी आज फूलों सी उठाये 
 सांस धौंकनी हो गई चाची दई  उतार 
दिल पर रख कर हाथ बताया हुआ नहीं कम प्यार 
हुआ नहीं कम प्यार प्रिये कुछ अच्छा सा पकाओ
अच्छा ये है बात जाओ जी खुद ही बनाओ
आज मान लो बात हमारी फिर मत कहना 
मिसेज प्रिया ने प्योर गोल्ड का कंगन पहना
एजी सच्ची बोल दो कुछ तो हुआ जरूर 
बीपी हाई करने पर करो नहीं मजबूर
करो नहीं मजबूर तुम्ही हो मेरी जानू
पूरी होगी बात ज़रा बाबा को मना लूँ
करो नहीं मजबूर तुम्ही हो जानू प्यारी
बाबा जमघट आये स्वयं ही द्वार हमारी 
बाबा बाबा नहीं है स्वयं प्रकट भगवंत 
बैठे हैं बैठक में जमघट वाले संत
चाची की त्योरी चढ़ी सुर्ख हुए दो गाल
जल्दी उसे निकाल दो पार होए सब माल
पार होए सब माल घास खाई है तुमने 
अक्ल पर पत्थर डाल गए बाबा की सुनने
चाची आई जल्दी से बोली बाबा माफ़ी
बना नहीं कुछ भी आज है बाबा हम उपवासी  
सुनना इतना ही रहा बाबा का गुस्सा भड़का
डमरू वाले हाथ को बिजली जैसा तड़का
चाची गौर से देखकर बोली त्योरी तान
कल्लू मेरी झुमकी दे दे या ले लूं तेरे प्राण
ले लूं तेरे प्रान ढूंढती कब से तुझको
कब तक खैर मनाएगा आज तू गया ही समझो
सुनते इतना कांप गया बोला साष्टांग
चाची पैसे सब रखो बक्श दो मेरे प्राण
बक्श दो मेरे प्राण लो दोनो कान भी पकड़े 
चाचा हंस कर बोल दिए क्या रुलाएगा पगले
कहो प्रिये मेहमान को कैसे लिया पहचान
चप्पल पीछे छोड़ कर भाग गया शैतान
भाग गया शैतान प्रिये कुछ तो समझाओ
दिल है मेरा कूद रहा यू न मुस्काओ
पूछ रहे हो क्या मुझे है इतना भी है भान
फूलवती ये आपकी  नानी है शैतान
नानी है शैतान अभी ये बच्चा है बस
जासूसी अब छोड़ दी मगर ये छूटी है कब
आंख फडकती देख के हुआ मुझे अहसास
लटके झटके देख के कल्लू का आभास
कल्लू का आभास मैने फिर तुक्का मारा 
इक झटके में लोट गया चरणों मे बेचारा
चाचा हुए प्रसन्न कहा ओ फुल्लो प्यारी
तू तो मेरे दिल मे रहती जान हमारी
चाची मुस्काई जरा बोली त्योरी तान
कंगन हमको दे दो वर्ना गई तुम्हारी जान
गई तुम्हारी जान चाचा थोड़े घबराये
शाम को बात करूंगा अभी रखो ये झुमके आये
चाचा सोचे आज तो छिड़ जाती फिर जंग
हे प्रभु आपके लोक में कैसे कैसे संत

शनिवार, 22 मई 2021

टिके बैठे हो

जब तुम होते हो मेरे पास तो मै कहता हूं,
ए वक़्त ठहर जाओ क्यों बहते हो ।
जब तुम चले जाते हो तो लगता है,
वक़्त तुम गुजर क्यूं नही जाते क्यों बैठे हो ।
रोज रोज तेरा जाना जरूरी है क्यो, ये पूंछ लेता मगर
तेरे साथ भूल जाता हूँ खुद को कोई सवाल कैसे हो ।
साथ भी ऐसा कि सांस और धड़कन सा,
एक न हो दूजा मिराज जैसे हो ।
मैं कितना भी दूर चला जाऊं लगता है कोई पीछे है,
तुम हो कि साया या साये भी तुम जैसे हो ।
वक़्त से धीमा जहर कोई नही, ऐसा लगता है मुझे,
बेअसर वक़्त है जब तक मेरे दिल से टिके बैठे हो।

मिराज: मृगतृष्णा

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