लगता है दास को आवाज दे रहे हो
बूंदे बरसती है तन पर तो मुझे
लगता है नटराज आप साज दे रहे हो
हर कण जब आप ही आप हो निराकार
क्यों मुझ कण को विरह का संताप दे रहे हो
बीते मेरी शिव शिव रटते, चाहे कितनी हो उमरिया
भूल ही जाऊँ कौन हूँ मैं, और कौन है मेरी डगरिया
मुझे पता कुछ आज है रूठे, कल मानेंगे भोलेनाथ
चरणों से ही बस जाऊंगा, जब थामेंगे मेरी उंगलिया
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