मनवा लेखक हम तो सेवक
रहमत हुई की इल्म ने पहचाना है मुझे, हर शख्श की तक़दीर यूँ रोशन नहीं होती....
शुक्रवार, 18 मार्च 2022
होली
वो खुशी, खुश होने के बहाने चले गए।
गले मिलने वाले बिन मिले ही चले गए।
होली तो आई इस बार भी वैसे ही,
लगता था उसके रंगों के रंग चले गए
दूरियां बढ़ती गई उम्र के संग ऐसी
कि सब अपने फोन में चले गए।
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