शुक्रवार, 24 मई 2013

क्या यही प्यार है...

नादानों की बस्ती में कुछ राज नहीं होता 
हर फूल में खुशबू का एहसास नहीं होता 
 ये पूरी होगी कैसे जन्न्त की चाह आखिर
जब सजदा ए खुदा में बिश्वास नहीं होता 

हम जान गवा बैठे की वो मेरा महताब है
सुर्ख गालों पर मेरी खातिर शवाव है
ना जानना ही चाहा न जान ही हम पाये
मेरी जान के चेहरे पर असली नकाब है  

हम लाये थे तूफ़ान से कश्ती निकाल के 
अब फिर वही बापस चले सब देख भाल के
फिर इश्क का मसीहा हमको बुला रहा है
सब मिट रहे है दिल से जो कुछ मलाल थे

कभी किसी के आंसू पोछो तो कुछ उसको जानोगे 
गोद में सर आँखों में आँखे तो दिल की तुम मानोगे
बहुत जला कर राख बनाये ढेर पे कुर्सी डाले हो 
चिंगारी से दिया जलाओ तो सबको पहचानोगे 

प्यार में गुस्ताख हो जाये तो मुआफ कर दो 
ना कोई गिला दिल में मुझे प्यार की मेहर दो
मैं चाहता हूँ तुमको एहसान नहीं कोई 
मेरे दिल को अपना घर कर मेरे घर को अपना कर लो

सूद चुकाए जाते हैं क्योँ दिल का दांव लगाया था 
हार जाना जब आदत थी क्यों किस्मत को आजमाया था 
आखों में चमक होंटो पे हंसी जब अपनी नहीं मालूम मुझे
दिल पर मेरे हाथ क्यों रक्खा जब रखना मुझे पराया था 



समाज

इस समाज और कुछ नही बस शोर मचाना आता है
अच्छे दिन आएंगे एक दिन, दिल बहलाना आता है
जिम्मेदारी किस पर डालें, चर्चा है हर बस्ती में 
इसकी गलती उसकी गलती रोज बहाना आता है

जिन्दा होने का सबब बूझो ना कैसे
लगे लब से लब पूछो ना किस्से
वो घुलकर उतर गए सांसो में ऐसे
पिघले सूरज का सांझ में उतरना जैसे

रूठो मत अब मान ही जाओ अच्छा है
कब मानोगे प्यार भी मेरा सच्चा है 
सोच लो छलक कर रो न दे कहीं
मानो या ना मानो दिल तो बच्चा है  


मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

बेशर्म जमाना

"बेशर्म जमाना " कहता है ये बेटी किसकी कौन है ये
जज्बाती है, नादाँ है ये गूंगी तो नहीं पर मौन है ये
ये बातें सुनती रिश्तों की तो कांप उठे कर नैन सजल
किस्से पूछू कोई बतला दो पहचानो रुदन हाँ कौन है ये
कोरा काजल बन बही है ये श्रंगार नहीं बन पाई है
जीवन में अश्रुधार सिवा कोई राग नहीं दे पाई है
अभी बचपन ही तो लांघा है मासूम सी है पर कौन है ये
घर की इज्ज़त गृह लक्ष्मी थी, बेटी या बहन या पत्नी थी
रोशन थी घर की दीवारें इससे क्यारी भी फूली थी
अब नहीं जरूरी कौन है बस अब तो सिर्फ अछूत है ये
 कोई कहता प्रेमी छोड़ गया कोई बोले घर से भागी है
कोई खड़ा मौन फटे वस्त्र तके कोई कहे बड़ी अपराधी है
हमउम्र है मेरी बेटी से कैसे कह दूं मैं कौन है ये 

गुडिया के अपराधी हम सभी हैं क्यूंकि हम उसी समाज का हिस्सा है जिसका वह शिकार हुई 
...