इस शहर ने मुझे क्या क्या सिखाया है
मैं जब जब भी गिरा ये मुस्कुराया है
कभी छत ढूंढता था सिर ढकने को छोटी सी
अब तो फुरसत नही रुकने की, कैसा काम आया है
नए रास्तो से डरकर निकलता था कभी
रोशनी कर चेहरों से इंसान पहचानता था सभी
आज रास्ते पैरों से और इंसान कीमत से पहचानता हूं
बहुत देर में, वक़्त गुजरते गुजरते ऐसा मुकाम आया है
मुझे दर्द होता था गॉंव में कोई भी बीमार हो
सहने का तजुर्बा न था किसी पर वक़्त की मार हो
अब अर्थी भी पास से गुजरे तो फोन रखता नही
इस शहर ने शहरी होने का ऐसा नशा सुंघाया है
इस्तेमाल करो सबको या हो जाओ
जब तक काम न निकले, मंडराओ
मक्खी से फेंके जाओगे इसलिए काम के बने रहो
बस इसलिए पुर्जा पुर्जा काम मे लगाया है
जो दिखता है वो बिकता है, तजुर्बा किया मैंने
कंधे पर चढ़कर और ऊंचा होने दिया मैंने
चढ़ने वाले ने जब मेरे सिर पर ठीकरा फोड़ दिया
तब पहली बार किसी साथी को औंधे मुँह गिराया है
पैसा पावर और पागलपन अहम का
कैसा नशा है, अपना मजा है वहम का
रास आने लगा है, शहर सिनेमा सा चल रहा आंखों में
मैंने वो सब देखा है जो जो इसने मुझे दिखाया है
अब शहर से कोई गिला नही है कि
मैं जब भी गिरा ये मुस्कुराया है।
शहर के एहसान गांव से ज्यादा है इसलिए
लड़ जाता हूं किसी ने मुझे देहाती बताया है
प्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना
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