मनवा लेखक हम तो सेवक
रहमत हुई की इल्म ने पहचाना है मुझे, हर शख्श की तक़दीर यूँ रोशन नहीं होती....
गुरुवार, 3 जून 2021
मगरूर
उनको अपना कहते कहते हम अपनो से दूर हुए
मिलने मुझसे ना आये वो कितने वो मगरूर हुए
दर दर दौड़े घर घर भटके पता पूछने हम उनका
वो न जाने इस चक्कर मे कितने हम मज़बूर हुए
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